स्त्रीपुंसव्यतिषञ्जनं जनयतः पत्युः प्रजानामभू-
दभ्यासः परिपाकिमः किमनयोर्दाम्पत्यसंपत्तये ।
आसंसारपुरन्ध्रिपूरुषमिथःप्रेमार्पणक्रीडया-
प्येतज्जम्पतिगाढरागरचना प्राकर्षि चेतोभुवः ॥
स्त्रीपुंसव्यतिषञ्जनं जनयतः पत्युः प्रजानामभू-
दभ्यासः परिपाकिमः किमनयोर्दाम्पत्यसंपत्तये ।
आसंसारपुरन्ध्रिपूरुषमिथःप्रेमार्पणक्रीडया-
प्येतज्जम्पतिगाढरागरचना प्राकर्षि चेतोभुवः ॥
दभ्यासः परिपाकिमः किमनयोर्दाम्पत्यसंपत्तये ।
आसंसारपुरन्ध्रिपूरुषमिथःप्रेमार्पणक्रीडया-
प्येतज्जम्पतिगाढरागरचना प्राकर्षि चेतोभुवः ॥
अन्वयः
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प्रजानाम् पत्युः स्त्री-पुंस-व्यतिषञ्जनम् जनयतः (ब्रह्मणः) अनयोः दाम्पत्य-संपत्तये किम् परिपाकिमः अभ्यासः अभूत्? चेतोभुवः आ-संसार-पुरन्ध्रि-पूरुष-मिथः-प्रेम-अर्पण-क्रीडया अपि एतत्-जम्पति-गाढ-राग-रचना प्राकर्षि ।
Summary
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Was the creation of this couple's marital perfection the matured practice of Brahma, the lord of creatures who creates the union of man and woman? Or was the creation of this couple's deep love perfected by Kamadeva through his sport of inspiring mutual love between men and women since the beginning of the world?
पदच्छेदः
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| स्त्रीपुंसव्यतिषञ्जनम् | स्त्री–पुंस्–व्यतिषञ्जन (२.१) | the union of man and woman |
| जनयतः | जनयत् (√जन्+णिच्+शतृ, ६.१) | of the one who creates |
| पत्युः | पति (६.१) | of the lord |
| प्रजानाम् | प्रजा (६.३) | of creatures |
| अभूत् | अभूत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| अभ्यासः | अभ्यास (१.१) | practice |
| परिपाकिमः | परिपाकिम (१.१) | perfected |
| किम् | किम् | what? |
| अनयोः | इदम् (६.२) | of these two |
| दाम्पत्यसंपत्तये | दाम्पत्य–संपत्ति (४.१) | for the perfection of the marital state |
| आसंसारपुरन्ध्रिपूरुषमिथःप्रेमार्पणक्रीडया | आसंसार–पुरन्ध्रि–पूरुष–मिथस्–प्रेम–अर्पण–क्रीडा (३.१) | by the play of offering mutual love between men and women since the beginning of creation |
| अपि | अपि | also |
| एतज्जम्पतिगाढरागरचना | एतत्–जम्पति–गाढ–राग–रचना (१.१) | the creation of the deep love of this couple |
| प्राकर्षि | प्राकर्षि (प्र√कृष् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was perfected |
| चेतोभुवः | चेतोभु (६.१) | of Kamadeva |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्त्री | पुं | स | व्य | ति | ष | ञ्ज | नं | ज | न | य | तः | प | त्युः | प्र | जा | ना | म | भू |
| द | भ्या | सः | प | रि | पा | कि | मः | कि | म | न | यो | र्दा | म्प | त्य | सं | प | त्त | ये |
| आ | सं | सा | र | पु | र | न्ध्रि | पू | रु | ष | मि | थः | प्रे | मा | र्प | ण | क्री | ड | या |
| प्ये | त | ज्ज | म्प | ति | गा | ढ | रा | ग | र | च | ना | प्रा | क | र्षि | चे | तो | भु | वः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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