काश्चिन्निर्माय चक्षुःप्रसृतिचुलुकितं तास्वशङ्कन्त कान्ता
मौग्ध्यादाचूडमोघैर्निचुलितमिव तं भूषणानां मणीनाम् ।
साहस्रीभिर्निमेषाकृतमतिभिरयं दृग्भिरालिङ्गितः किं
ज्योतिष्टोमादियज्ञश्रुतिफलजगतीसार्वभौमभ्रमेण ॥
काश्चिन्निर्माय चक्षुःप्रसृतिचुलुकितं तास्वशङ्कन्त कान्ता
मौग्ध्यादाचूडमोघैर्निचुलितमिव तं भूषणानां मणीनाम् ।
साहस्रीभिर्निमेषाकृतमतिभिरयं दृग्भिरालिङ्गितः किं
ज्योतिष्टोमादियज्ञश्रुतिफलजगतीसार्वभौमभ्रमेण ॥
मौग्ध्यादाचूडमोघैर्निचुलितमिव तं भूषणानां मणीनाम् ।
साहस्रीभिर्निमेषाकृतमतिभिरयं दृग्भिरालिङ्गितः किं
ज्योतिष्टोमादियज्ञश्रुतिफलजगतीसार्वभौमभ्रमेण ॥
अन्वयः
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काश्चित् कान्ताः मौग्ध्यात् तम् आचूडम् भूषणानाम् मणीनाम् ओघैः निचुलितम् इव (दृष्ट्वा) चक्षुःप्रसृतिचुलुकितम् निर्माय तासु अशङ्कन्त । किम् अयम् ज्योतिष्टोम-आदि-यज्ञ-श्रुति-फल-जगती-सार्वभौम-भ्रमेण साहस्रीभिः निमेष-अकृत-मतिभिः दृग्भिः आलिङ्गितः?
Summary
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Some lovely women, out of simplicity, seeing Nala as if covered from head to toe by floods of gems from his ornaments, cupped their hands with their wide-open eyes and suspected in them (the gems). Was he being embraced by thousands of unblinking eyes due to the illusion that he was the emperor of the world, the fruit of Vedic sacrifices like the Jyotishtoma?
पदच्छेदः
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| काश्चित् | कश्चित् | some |
| निर्माय | निर्माय (निर्√मा+णिच्+ल्यप्) | having formed |
| चक्षुःप्रसृतिचुलुकितम् | चक्षुस्–प्रसृति–चुलुकित (२.१) | cupped by the spreading of the eyes |
| तासु | तद् (७.३) | in them |
| अशङ्कन्त | अशङ्कन्त (√शङ्क् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | they suspected |
| कान्ताः | कान्ता (१.३) | lovely women |
| मौग्ध्यात् | मौग्ध्य (५.१) | from simplicity |
| आचूडम् | आचूडम् | up to the head |
| ओघैः | ओघ (३.३) | with floods |
| निचुलितम् | निचुलित (नि√चुल्+क्त, २.१) | covered |
| इव | इव | as if |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| भूषणानाम् | भूषण (६.३) | of ornaments |
| मणीनाम् | मणि (६.३) | of gems |
| साहस्रीभिः | साहस्री (३.३) | by thousands |
| निमेषाकृतमतिभिः | निमेष–अकृत (√कृ+क्त)–मति (३.३) | by those whose intention is not to blink |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| दृग्भिः | दृश् (३.३) | by eyes |
| आलिङ्गितः | आलिङ्गित (आ√लिङ्ग्+क्त, १.१) | embraced |
| किम् | किम् | what? |
| ज्योतिष्टोमादियज्ञश्रुतिफलजगतीसार्वभौमभ्रमेण | ज्योतिष्टोम–आदि–यज्ञ–श्रुति–फल–जगती–सार्वभौम–भ्रम (३.१) | due to the illusion of being the emperor of the world, the fruit of Vedic sacrifices like Jyotishtoma |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | श्चि | न्नि | र्मा | य | च | क्षुः | प्र | सृ | ति | चु | लु | कि | तं | ता | स्व | श | ङ्क | न्त | का | न्ता |
| मौ | ग्ध्या | दा | चू | ड | मो | घै | र्नि | चु | लि | त | मि | व | तं | भू | ष | णा | नां | म | णी | नाम् |
| सा | ह | स्री | भि | र्नि | मे | षा | कृ | त | म | ति | भि | र | यं | दृ | ग्भि | रा | लि | ङ्गि | तः | किं |
| ज्यो | ति | ष्टो | मा | दि | य | ज्ञ | श्रु | ति | फ | ल | ज | ग | ती | सा | र्व | भौ | म | भ्र | मे | ण |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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