अजानती कापि विलोकनोत्सुका
समीरधूतार्धमपि स्तनांशुकम् ।
कुचेन तस्मै चलतेऽकरोत्पुरः
पुराङ्गना मङ्गलकुम्भसंभृतिम् ॥
अजानती कापि विलोकनोत्सुका
समीरधूतार्धमपि स्तनांशुकम् ।
कुचेन तस्मै चलतेऽकरोत्पुरः
पुराङ्गना मङ्गलकुम्भसंभृतिम् ॥
समीरधूतार्धमपि स्तनांशुकम् ।
कुचेन तस्मै चलतेऽकरोत्पुरः
पुराङ्गना मङ्गलकुम्भसंभृतिम् ॥
अन्वयः
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विलोकनोत्सुका का अपि पुराङ्गना समीरधूतार्धम् अपि स्तनांशुकम् अजानती, चलते तस्मै पुरः कुचेन मङ्गलकुम्भसंभृतिम् अकरोत् ।
Summary
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A certain city woman, extremely eager to see Nala, was so engrossed that she didn't notice the garment over her breast had been half blown aside by the wind. With her exposed breast, she unknowingly presented an auspicious welcome pitcher for the departing king.
पदच्छेदः
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| अजानती | अजानत् (√ज्ञा+शतृ, १.१) | not noticing |
| का | किम् (१.१) | some |
| अपि | अपि | also |
| विलोकनोत्सुका | विलोकन–उत्सुका (१.१) | eager to see |
| समीरधूतार्धम् | समीर–धूत–अर्धम् (२.१) | half-shaken by the wind |
| अपि | अपि | even |
| स्तनांशुकम् | स्तन–अंशुक (२.१) | the cloth covering the breast |
| कुचेन | कुच (३.१) | with her breast |
| तस्मै | तद् (४.१) | for him |
| चलते | चलत् (√चल्+शतृ, ४.१) | for the departing one |
| अकरोत् | अकरोत् (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| पुरः | पुरस् | in front |
| पुराङ्गना | पुर–अङ्गना (१.१) | a city woman |
| मङ्गलकुम्भसंभृतिम् | मङ्गल–कुम्भ–संभृति (२.१) | the presentation of an auspicious pitcher |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | जा | न | ती | का | पि | वि | लो | क | नो | त्सु | का |
| स | मी | र | धू | ता | र्ध | म | पि | स्त | नां | शु | कम् |
| कु | चे | न | त | स्मै | च | ल | ते | ऽक | रो | त्पु | रः |
| पु | रा | ङ्ग | ना | म | ङ्ग | ल | कु | म्भ | सं | भृ | तिम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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