विदर्भनाम्नस्त्रिदिवस्य वीक्षितुं
रसोदयादप्सरसस्तमुज्ज्वलम् ।
गृहाद्गृहादेत्य धृतप्रसाधना
व्यराजयन्राजपथानथाधिकम् ॥
विदर्भनाम्नस्त्रिदिवस्य वीक्षितुं
रसोदयादप्सरसस्तमुज्ज्वलम् ।
गृहाद्गृहादेत्य धृतप्रसाधना
व्यराजयन्राजपथानथाधिकम् ॥
रसोदयादप्सरसस्तमुज्ज्वलम् ।
गृहाद्गृहादेत्य धृतप्रसाधना
व्यराजयन्राजपथानथाधिकम् ॥
अन्वयः
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अथ विदर्भनाम्नः त्रिदिवस्य अप्सरसः तम् उज्ज्वलं वीक्षितुं रसोदयात् गृहात् गृहात् एत्य धृतप्रसाधनाः (सत्यः) राजपथान् अधिकं व्यराजयन् ।
Summary
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Then, the celestial women (Apsaras) of that heaven on earth, the city of Vidarbha, were overcome with eagerness to see the radiant Nala. Coming out from every house, fully adorned, they graced the royal roads, making them shine even more brightly.
पदच्छेदः
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| विदर्भनाम्नः | विदर्भ–नामन् (६.१) | named Vidarbha |
| त्रिदिवस्य | त्रिदिव (६.१) | of heaven |
| वीक्षितुम् | वीक्षितुम् (वि√ईक्ष्+तुमुन्) | to see |
| रसोदयात् | रस–उदय (५.१) | due to the rise of eagerness |
| अप्सरसः | अप्सरस् (१.३) | the Apsaras |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| उज्ज्वलम् | उज्ज्वल (२.१) | radiant |
| गृहात् | गृह (५.१) | from house |
| गृहात् | गृह (५.१) | from house |
| एत्य | एत्य (√इ+ल्यप्) | having come |
| धृतप्रसाधनाः | धृत–प्रसाधना (१.३) | having put on their adornments |
| व्यराजयन् | व्यराजयन् (वि√राज् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | adorned |
| राजपथान् | राजपथ (२.३) | the royal roads |
| अथ | अथ | then |
| अधिकम् | अधिकम् | more |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | द | र्भ | ना | म्न | स्त्रि | दि | व | स्य | वी | क्षि | तुं |
| र | सो | द | या | द | प्स | र | स | स्त | मु | ज्ज्व | लम् |
| गृ | हा | द्गृ | हा | दे | त्य | धृ | त | प्र | सा | ध | ना |
| व्य | रा | ज | य | न्रा | ज | प | था | न | था | धि | कम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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