व्यलोकि लोकेन न केवलं चल-
न्मुदा तदीयाभरणाऋपणाद्युतिः ।
अदर्शि विस्फारितरत्नलोचनैः
परस्परेणेव विभूषणैरपि ॥
व्यलोकि लोकेन न केवलं चल-
न्मुदा तदीयाभरणाऋपणाद्युतिः ।
अदर्शि विस्फारितरत्नलोचनैः
परस्परेणेव विभूषणैरपि ॥
न्मुदा तदीयाभरणाऋपणाद्युतिः ।
अदर्शि विस्फारितरत्नलोचनैः
परस्परेणेव विभूषणैरपि ॥
अन्वयः
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लोकेन चलन्मुदा तदीयाभरणात् ऋपणात् द्युतिः न केवलं व्यलोकि । विस्फारितरत्नलोचनैः विभूषणैः अपि परस्परेण इव अदर्शि ।
Summary
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The lustre emanating from Nala's ornaments was not only seen by the joyful people. It was also seen by the ornaments themselves, as if they were gazing at each other with their wide-open eyes made of gems.
पदच्छेदः
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| व्यलोकि | व्यलोकि (वि√लोक् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| लोकेन | लोक (३.१) | by the people |
| न | न | not |
| केवलम् | केवलम् | only |
| चलन्मुदा | चलत्–मुदा (३.१) | with moving joy |
| तदीयाभरणात् | तदीय–आभरण (५.१) | from his ornaments |
| ऋपणात् | ऋपण (५.१) | from the setting |
| द्युतिः | द्युति (१.१) | the lustre |
| अदर्शि | अदर्शि (√दृश् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| विस्फारित | विस्फारित (वि√स्फर्+णिच्+क्त) | widened |
| रत्नलोचनैः | रत्न–लोचन (३.३) | with gem-like eyes |
| परस्परेण | परस्पर (३.१) | by each other |
| इव | इव | as if |
| विभूषणैः | विभूषण (३.३) | by the ornaments |
| अपि | अपि | also |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्य | लो | कि | लो | के | न | न | के | व | लं | च | ल | |
| न्मु | दा | त | दी | या | भ | र | णा | ऋ | प | णा | द्यु | तिः |
| अ | द | र्शि | वि | स्फा | रि | त | र | त्न | लो | च | नैः | |
| प | र | स्प | रे | णे | व | वि | भू | ष | णै | र | पि | |
| ज | त | ज | र | |||||||||
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