विदर्भराजोऽपि समं तनूजया
प्रविश्य हृष्यन्नवरोधमात्मनः ।
शशंस देवीमनुजातसंशयां
प्रतीच्छ जामातरमुत्सुके नलम् ॥
विदर्भराजोऽपि समं तनूजया
प्रविश्य हृष्यन्नवरोधमात्मनः ।
शशंस देवीमनुजातसंशयां
प्रतीच्छ जामातरमुत्सुके नलम् ॥
प्रविश्य हृष्यन्नवरोधमात्मनः ।
शशंस देवीमनुजातसंशयां
प्रतीच्छ जामातरमुत्सुके नलम् ॥
अन्वयः
AI
हृष्यन् विदर्भराजः अपि तनूजया समम् आत्मनः अवरोधं प्रविश्य, अनुजातसंशयां देवीम् शशंस - 'उत्सुके! जामातरं नलं प्रतीच्छ'।
Summary
AI
The rejoicing king of Vidarbha, entering his inner apartments with his daughter, spoke to the queen, who had grown doubtful: 'O eager one, accept Nala as your son-in-law.'
पदच्छेदः
AI
| विदर्भराजः | विदर्भ–राजन् (१.१) | The king of Vidarbha |
| अपि | अपि | also |
| समं | समम् | with |
| तनूजया | तनूजा (३.१) | his daughter |
| प्रविश्य | प्रविश्य (प्र√विश्+ल्यप्) | having entered |
| हृष्यन् | हृष्यत् (√हृष्+शतृ, १.१) | rejoicing |
| अवरोधम् | अवरोध (२.१) | the inner apartments |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | his own |
| शशंस | शशंस (√शंस कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | told |
| देवीम् | देवी (२.१) | the queen |
| अनुजातसंशयाम् | अनुजात–संशय (२.१) | who had become doubtful |
| प्रतीच्छ | प्रतीच्छ (प्रति√इष् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | accept |
| जामातरम् | जामातृ (२.१) | son-in-law |
| उत्सुके | उत्सुका (८.१) | O eager one |
| नलम् | नल (२.१) | Nala |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | द | र्भ | रा | जो | ऽपि | स | मं | त | नू | ज | या |
| प्र | वि | श्य | हृ | ष्य | न्न | व | रो | ध | मा | त्म | नः |
| श | शं | स | दे | वी | म | नु | जा | त | सं | श | यां |
| प्र | ती | च्छ | जा | मा | त | र | मु | त्सु | के | न | लम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.