क्रमाधिकामुत्तरमुत्तरं श्रियं
पुपोष यां भूषणचुम्बनैरियम् ।
पुरः पुरस्तस्थुषि रामणीयके
तया बबाधेऽवधिबुद्धिधोरणिः ॥
क्रमाधिकामुत्तरमुत्तरं श्रियं
पुपोष यां भूषणचुम्बनैरियम् ।
पुरः पुरस्तस्थुषि रामणीयके
तया बबाधेऽवधिबुद्धिधोरणिः ॥
पुपोष यां भूषणचुम्बनैरियम् ।
पुरः पुरस्तस्थुषि रामणीयके
तया बबाधेऽवधिबुद्धिधोरणिः ॥
अन्वयः
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इयम् भूषण-चुम्बनैः याम् क्रम-अधिकाम् उत्तरम् उत्तरम् श्रियम् पुपोष, पुरः पुरः तस्थुषि तस्मिन् रामणीयके तया श्रिया अवधि-बुद्धि-धोरणिः बबाधे।
Summary
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She nourished a beauty that successively increased with each 'kiss' of an ornament. As this loveliness stood ever advancing, it obstructed any possibility of conceiving a limit to her beauty.
पदच्छेदः
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| क्रम-अधिकाम् | क्रमाधिक (२.१) | successively increasing |
| उत्तरम्-उत्तरम् | उत्तरोत्तरम् | higher and higher |
| श्रियम् | श्री (२.१) | beauty |
| पुपोष | पुपोष (√पुष् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | nourished |
| याम् | यद् (२.१) | which |
| भूषण-चुम्बनैः | भूषणचुम्बन (३.३) | by the kisses of the ornaments |
| इयम् | इदम् (१.१) | she |
| पुरः-पुरः | पुरःपुरः | ever in front |
| तस्थुषि | तस्थिवस् (√स्था+क्वसु, ७.१) | standing |
| रामणीयके | रामणीयक (७.१) | in loveliness |
| तया | तद् (३.१) | by that beauty |
| बबाधे | बबाधे (√बाध् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was obstructed |
| अवधि-बुद्धि-धोरणिः | अवधिबुद्धिधोरणि (१.१) | the train of thought about a limit |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्र | मा | धि | का | मु | त्त | र | मु | त्त | रं | श्रि | यं |
| पु | पो | ष | यां | भू | ष | ण | चु | म्ब | नै | रि | यम् |
| पु | रः | पु | र | स्त | स्थु | षि | रा | म | णी | य | के |
| त | या | ब | बा | धे | ऽव | धि | बु | द्धि | धो | र | णिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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