स्वयं तदङ्गेषु गतेषु चारुतां
परस्परेणैव विभूषितेषु च
किमूचिरेऽलंकरणानि तानि
तद्दृतैव तेषां करणं बभूव
यत्
स्वयं तदङ्गेषु गतेषु चारुतां
परस्परेणैव विभूषितेषु च
किमूचिरेऽलंकरणानि तानि
तद्दृतैव तेषां करणं बभूव
यत्
परस्परेणैव विभूषितेषु च
किमूचिरेऽलंकरणानि तानि
तद्दृतैव तेषां करणं बभूव
यत्
अन्वयः
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तदङ्गेषु स्वयम् चारुताम् गतेषु परस्परेण एव च विभूषितेषु सत्सु, तानि अलंकरणानि किम् ऊचिरे? यत् तेषाम् तत्-धृता एव करणम् बभूव।
Summary
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Since her limbs were already beautiful by themselves and adorned by each other, what purpose did those ornaments serve? Indeed, the very fact of being worn by her was what made them ornaments.
पदच्छेदः
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| स्वयम् | स्वयम् | by themselves |
| तत्-अङ्गेषु | तदङ्ग (७.३) | on her limbs |
| गतेषु | गत (√गम्+क्त, ७.३) | having attained |
| चारुताम् | चारुता (२.१) | beauty |
| परस्परेण | परस्पर (३.१) | by each other |
| एव | एव | indeed |
| विभूषितेषु | विभूषित (वि√भूष्+णिच्+क्त, ७.३) | being adorned |
| च | च | and |
| किम् | किम् | what? |
| ऊचिरे | ऊचिरे (√वच् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | did they do |
| अलंकरणानि | अलंकरण (१.३) | the ornaments |
| तानि | तद् (१.३) | those |
| तत्-धृता | तद्धृता (१.१) | the state of being worn by her |
| तेषाम् | तद् (६.३) | of them |
| करणम् | करण (१.१) | the cause of being an ornament |
| बभूव | बभूव (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became |
| यत् | यत् | since |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | यं | त | द | ङ्गे | षु | ग | ते | षु | चा | रु | तां |
| प | र | स्प | रे | णै | व | वि | भू | षि | ते | षु | च |
| कि | मू | चि | रे | ऽलं | क | र | णा | नि | ता | नि | त |
| द्दृ | तै | व | ते | षां | क | र | णं | ब | भू | व | यत् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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