स्वरेण वीणेत्यविशेषणं पुरा
स्फुरत्तदीया खलु कण्ठकन्दली ।
अवाप्य तन्त्रीरथ सप्त मुक्तिका-
सरानराजत्परिवादिनी स्फुटम् ॥
स्वरेण वीणेत्यविशेषणं पुरा
स्फुरत्तदीया खलु कण्ठकन्दली ।
अवाप्य तन्त्रीरथ सप्त मुक्तिका-
सरानराजत्परिवादिनी स्फुटम् ॥
स्फुरत्तदीया खलु कण्ठकन्दली ।
अवाप्य तन्त्रीरथ सप्त मुक्तिका-
सरानराजत्परिवादिनी स्फुटम् ॥
अन्वयः
AI
पुरा तदीया कण्ठ-कन्दली स्वरेण अविशेषणम् वीणा इति खलु स्फुरत्। अथ सप्त मुक्तिका-सरान् तन्त्रीः इव अवाप्य स्फुटम् परिवादिनी इव अराजत्।
Summary
AI
Previously, her shoot-like throat, by its very tone, was simply a 'Veena' without any specific qualifier. Then, having obtained seven pearl necklaces like strings, it clearly shone like a 'Parivadini', a specific seven-stringed Veena.
पदच्छेदः
AI
| स्वरेण | स्वर (३.१) | by its tone |
| वीणा | वीणा (१.१) | a Veena |
| इति | इति | thus |
| अविशेषणम् | अविशेषण (१.१) | without any specific epithet |
| पुरा | पुरा | before |
| स्फुरत्-तदीया | स्फुरत्तदीय (१.१) | her shining |
| खलु | खलु | indeed |
| कण्ठ-कन्दली | कण्ठकन्दली (१.१) | the shoot-like throat |
| अवाप्य | अवाप्य (अव√आप्+ल्यप्) | having obtained |
| तन्त्रीः | तन्त्री (२.३) | strings |
| अथ | अथ | then |
| सप्त | सप्तन् | seven |
| मुक्तिका-सरान् | मुक्तिकासर (२.३) | pearl necklaces |
| अराजत् | अराजत् (√राज् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
| परिवादिनी | परिवादिनी (१.१) | a Parivadini Veena |
| स्फुटम् | स्फुटम् | clearly |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्व | रे | ण | वी | णे | त्य | वि | शे | ष | णं | पु | रा |
| स्फु | र | त्त | दी | या | ख | लु | क | ण्ठ | क | न्द | ली |
| अ | वा | प्य | त | न्त्री | र | थ | स | प्त | मु | क्ति | का |
| स | रा | न | रा | ज | त्प | रि | वा | दि | नी | स्फु | टम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.