निवेशितं यावकरागदीप्तये
लगत्तदीयाधरसीम्नि सिक्थकम् ।
रराज तत्रैव निवस्तुमुत्सुकं
मधूनि निर्धूय सुधासधर्मणि ॥
निवेशितं यावकरागदीप्तये
लगत्तदीयाधरसीम्नि सिक्थकम् ।
रराज तत्रैव निवस्तुमुत्सुकं
मधूनि निर्धूय सुधासधर्मणि ॥
लगत्तदीयाधरसीम्नि सिक्थकम् ।
रराज तत्रैव निवस्तुमुत्सुकं
मधूनि निर्धूय सुधासधर्मणि ॥
अन्वयः
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यावक-राग-दीप्तये तदीय-अधर-सीम्नि लगत् निवेशितम् सिक्थकम्, सुधा-सधर्मणि (अधरे) मधूनि निर्धूय तत्र एव निवस्तुम् उत्सुकम् इव रराज।
Summary
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A piece of beeswax, placed on the edge of her lip to enhance the brilliance of the red lac-dye, shone as if it were eager to reside right there on her nectar-like lip, having rejected all other nectars.
पदच्छेदः
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| निवेशितम् | निवेशित (नि√विश्+णिच्+क्त, १.१) | placed |
| यावक-राग-दीप्तये | यावकरागदीप्ति (४.१) | for the brilliance of the red lac-dye |
| लगत्-तदीय-अधर-सीम्नि | लगत्तदीयाधरसीमन् (७.१) | on the edge of her lip which it was touching |
| सिक्थकम् | सिक्थक (१.१) | a piece of beeswax |
| रराज | रराज (√राज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
| तत्र | तत्र | there |
| एव | एव | indeed |
| निवस्तुम् | निवस्तुम् (नि√वस्+तुमुन्) | to reside |
| उत्सुकम् | उत्सुक (१.१) | eager |
| मधूनि | मधु (२.३) | nectars |
| निर्धूय | निर्धूय (निर्√धू+ल्यप्) | having rejected |
| सुधा-सधर्मणि | सुधासधर्मन् (७.१) | on that which has the quality of nectar |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नि | वे | शि | तं | या | व | क | रा | ग | दी | प्त | ये |
| ल | ग | त्त | दी | या | ध | र | सी | म्नि | सि | क्थ | कम् |
| र | रा | ज | त | त्रै | व | नि | व | स्तु | मु | त्सु | कं |
| म | धू | नि | नि | र्धू | य | सु | धा | स | ध | र्म | णि |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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