धृतं वतंसोत्पलयुग्ममेतया
व्यराजदस्यां पतिते दृशाविव ।
मनोभुवान्ध्यं गमितस्य पश्यतः
स्थिते लगित्वा रसिकस्य कस्यचित् ॥
धृतं वतंसोत्पलयुग्ममेतया
व्यराजदस्यां पतिते दृशाविव ।
मनोभुवान्ध्यं गमितस्य पश्यतः
स्थिते लगित्वा रसिकस्य कस्यचित् ॥
व्यराजदस्यां पतिते दृशाविव ।
मनोभुवान्ध्यं गमितस्य पश्यतः
स्थिते लगित्वा रसिकस्य कस्यचित् ॥
अन्वयः
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एतया धृतं वतंस-उत्पल-युग्मं, मनोभुवा अन्ध्यं गमितस्य पश्यतः कस्यचित् रसिकस्य अस्याम् पतिते दृशौ लगित्वा स्थिते इव व्यराजत्।
Summary
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The pair of lotus ear-ornaments worn by her shone as if they were the very eyes of some connoisseur. Struck blind with passion by Kama, his eyes had fallen upon her, attached themselves, and remained there.
पदच्छेदः
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| धृतम् | धृत (√धृ+क्त, १.१) | worn |
| वतंस | वतंस | ear-ornament |
| उत्पल | उत्पल | lotus |
| युग्मम् | युग्म (१.१) | the pair of |
| एतया | एतद् (३.१) | by her |
| व्यराजत् | व्यराजत् (वि√राज् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | shone |
| अस्याम् | इदम् (७.१) | on her |
| पतिते | पतित (√पत्+क्त, १.२) | fallen |
| दृशौ | दृश् (१.२) | eyes |
| इव | इव | as if |
| मनोभुवा | मनोभु (३.१) | by Kama |
| अन्ध्यम् | अन्ध्य (२.१) | to blindness |
| गमितस्य | गमित (√गम्+णिच्+क्त, ६.१) | of one made to go |
| पश्यतः | पश्यत् (√दृश्+शतृ, ६.१) | of one looking |
| स्थिते | स्थित (√स्था+क्त, १.२) | remained |
| लगित्वा | लगित्वा (√लग्+क्त्वा) | having attached |
| रसिकस्य | रसिक (६.१) | of a connoisseur |
| कस्यचित् | कश्चित् (६.१) | of a certain |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धृ | तं | व | तं | सो | त्प | ल | यु | ग्म | मे | त | या |
| व्य | रा | ज | द | स्यां | प | ति | ते | दृ | शा | वि | व |
| म | नो | भु | वा | न्ध्यं | ग | मि | त | स्य | प | श्य | तः |
| स्थि | ते | ल | गि | त्वा | र | सि | क | स्य | क | स्य | चित् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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