अपाङ्गमालिङ्ग्य तदीयमुच्चकै-
रदीपि रेखा जनिताञ्जनेन या ।
अपाति सूत्रं तदिव द्वितीयया
वयःश्रिया वर्धयितुं विलोचने ॥
अपाङ्गमालिङ्ग्य तदीयमुच्चकै-
रदीपि रेखा जनिताञ्जनेन या ।
अपाति सूत्रं तदिव द्वितीयया
वयःश्रिया वर्धयितुं विलोचने ॥
रदीपि रेखा जनिताञ्जनेन या ।
अपाति सूत्रं तदिव द्वितीयया
वयःश्रिया वर्धयितुं विलोचने ॥
अन्वयः
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अञ्जनेन जनिता या रेखा तदीयम् अपाङ्गम् आलिङ्ग्य उच्चकैः अदीपि, (सा) द्वितीयया वयः-श्रिया विलोचने वर्धयितुं तत् सूत्रम् इव अपाति।
Summary
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The line of collyrium, extending long and embracing the outer corner of her eye, shone brightly. It seemed as if a second measuring line was cast by the beauty of her youth itself, in order to lengthen her eyes.
पदच्छेदः
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| अपाङ्गम् | अपाङ्ग (२.१) | the outer corner of the eye |
| आलिङ्ग्य | आलिङ्ग्य (आ√लिङ्ग्+ल्यप्) | having embraced |
| तदीयम् | तदीय (२.१) | her |
| उच्चकैः | उच्चकैः | long |
| अदीपि | अदीपि (√दीप् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone |
| रेखा | रेखा (१.१) | the line |
| जनिता | जनित (√जन्+णिच्+क्त, १.१) | created |
| अञ्जनेन | अञ्जन (३.१) | by the collyrium |
| या | यद् (१.१) | which |
| अपाति | अपाति (√पत् +णिच् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was cast |
| सूत्रम् | सूत्र (१.१) | a line |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| इव | इव | as if |
| द्वितीयया | द्वितीय (३.१) | by a second |
| वयः | वयस् | youth |
| श्रिया | श्री (३.१) | by the beauty of |
| वर्धयितुम् | वर्धयितुम् (√वृध्+णिच्+तुमुन्) | to lengthen |
| विलोचने | विलोचन (२.२) | the two eyes |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | पा | ङ्ग | मा | लि | ङ्ग्य | त | दी | य | मु | च्च | कै |
| र | दी | पि | रे | खा | ज | नि | ता | ञ्ज | ने | न | या |
| अ | पा | ति | सू | त्रं | त | दि | व | द्वि | ती | य | या |
| व | यः | श्रि | या | व | र्ध | यि | तुं | वि | लो | च | ने |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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