विजित्य दास्यादिव वारिहारिताम्
अवापितास्तत्कुचयोर्द्वयेन ताः ।
शिखामवाक्षुः सहकारशाखिन-
स्त्रपाभरम्लानिमिवानतैर्मुखैः ॥
विजित्य दास्यादिव वारिहारिताम्
अवापितास्तत्कुचयोर्द्वयेन ताः ।
शिखामवाक्षुः सहकारशाखिन-
स्त्रपाभरम्लानिमिवानतैर्मुखैः ॥
अवापितास्तत्कुचयोर्द्वयेन ताः ।
शिखामवाक्षुः सहकारशाखिन-
स्त्रपाभरम्लानिमिवानतैर्मुखैः ॥
अन्वयः
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तत्कुचयोः द्वयेन दास्यात् इव वारिहारितां विजित्य अवापिताः ताः सहकारशाखिनः आनतैः मुखैः त्रपाभरम्लानिम् इव शिखाम् अवाक्षुः।
Summary
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The nearby mango trees, as if defeated by her pair of breasts and forced into the servitude of carrying water, bent their tops. With their drooping flowers as faces, they seemed to wither from the burden of shame.
पदच्छेदः
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| विजित्य | विजित्य (वि√जि+ल्यप्) | having been defeated |
| दास्यात् | दास्य (५.१) | from servitude |
| इव | इव | as if |
| वारिहारिताम् | वारि–हारिता (२.१) | the task of carrying water |
| अवापिताः | अवापित (अव√आप्+णिच्+क्त, १.३) | made to take up |
| तत्कुचयोः | तद्–कुच (६.२) | of her breasts |
| द्वयेन | द्वय (३.१) | by the pair |
| ताः | तद् (१.३) | those |
| शिखाम् | शिखा (२.१) | their tops |
| अवाक्षुः | अवाक्षुः (अव√अञ्च् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bent down |
| सहकारशाखिनः | सहकार–शाखिन् (१.३) | mango trees |
| त्रपाभरम्लानिम् | त्रपा–भर–म्लानि (२.१) | the withering from the burden of shame |
| इव | इव | as if |
| आनतैः | आनत (आ√नम्+क्त, ३.३) | with bent |
| मुखैः | मुख (३.३) | faces (flowers) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | जि | त्य | दा | स्या | दि | व | वा | रि | हा | रि | ता |
| म | वा | पि | ता | स्त | त्कु | च | यो | र्द्व | ये | न | ताः |
| शि | खा | म | वा | क्षुः | स | ह | का | र | शा | खि | न |
| स्त्र | पा | भ | र | म्ला | नि | मि | वा | न | तै | र्मु | खैः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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