उदस्य कुम्भीरथ शातकुम्भजाः
चतुष्कचारुत्विषि वेदिकोदरे ।
यथाकुलाचारमथावनीन्द्रजां
पुरन्ध्रिवर्गः स्नपयांबभूव ताम् ॥
उदस्य कुम्भीरथ शातकुम्भजाः
चतुष्कचारुत्विषि वेदिकोदरे ।
यथाकुलाचारमथावनीन्द्रजां
पुरन्ध्रिवर्गः स्नपयांबभूव ताम् ॥
चतुष्कचारुत्विषि वेदिकोदरे ।
यथाकुलाचारमथावनीन्द्रजां
पुरन्ध्रिवर्गः स्नपयांबभूव ताम् ॥
अन्वयः
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अथ पुरन्ध्रिवर्गः चतुष्कचारुत्विषि वेदिकोदरे शातकुम्भजाः कुम्भीः उदस्य, अथ ताम् अवनीन्द्रजां यथाकुलाचारं स्नपयांबभूव।
Summary
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Then, a group of married women placed golden pitchers on a beautifully radiant quadrangle at the center of an altar. Following this, they bathed the princess, Damayanti, in accordance with their family customs.
पदच्छेदः
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| उदस्य | उदस्य (उद्√अस्+ल्यप्) | having placed |
| कुम्भीः | कुम्भी (२.३) | pitchers |
| अथ | अथ | Then |
| शातकुम्भजाः | शातकुम्भ–जा (२.३) | made of gold |
| चतुष्कचारुत्विषि | चतुष्क–चारु–त्विष् (७.१) | on the beautifully radiant quadrangle |
| वेदिकोदरे | वेदिका–उदर (७.१) | in the center of the altar |
| यथाकुलाचारम् | यथाकुलाचारम् | according to family custom |
| अथ | अथ | then |
| अवनीन्द्रजां | अवनीन्द्र–जा (२.१) | the princess |
| पुरन्ध्रिवर्गः | पुरन्ध्रि–वर्ग (१.१) | the group of married women |
| स्नपयांबभूव | स्नपयांबभूव (√स्ना +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bathed |
| ताम् | तद् (२.१) | her |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द | स्य | कु | म्भी | र | थ | शा | त | कु | म्भ | जाः |
| च | तु | ष्क | चा | रु | त्वि | षि | वे | दि | को | द | रे |
| य | था | कु | ला | चा | र | म | था | व | नी | न्द्र | जां |
| पु | र | न्ध्रि | व | र्गः | स्न | प | यां | ब | भू | व | ताम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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