भूभृद्भिर्लम्भिताऽसौ करुणरसनदीमूर्तिमद्देवतात्वं
तातेनाभ्यर्थ्ययोग्याःसपदिनिजसखीर्दापयामासतेभ्यः ।
वैदर्भ्यास्तेऽप्यलाभात्कृतगमनमनःप्राणवाञ्छां विजघ्नुः
सख्यः संशिक्ष्य विद्याः सततधृतवयस्यानुकाराभिराभिः ॥
भूभृद्भिर्लम्भिताऽसौ करुणरसनदीमूर्तिमद्देवतात्वं
तातेनाभ्यर्थ्ययोग्याःसपदिनिजसखीर्दापयामासतेभ्यः ।
वैदर्भ्यास्तेऽप्यलाभात्कृतगमनमनःप्राणवाञ्छां विजघ्नुः
सख्यः संशिक्ष्य विद्याः सततधृतवयस्यानुकाराभिराभिः ॥
तातेनाभ्यर्थ्ययोग्याःसपदिनिजसखीर्दापयामासतेभ्यः ।
वैदर्भ्यास्तेऽप्यलाभात्कृतगमनमनःप्राणवाञ्छां विजघ्नुः
सख्यः संशिक्ष्य विद्याः सततधृतवयस्यानुकाराभिराभिः ॥
अन्वयः
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भूभृद्भिः करुणरसनदी मूर्तिमद्देवतात्वम् लम्भिता असौ (दमयन्ती) तातेन अभ्यर्थ्य तेभ्यः योग्याः निजसखीः सपदि दापयामास । ते अपि वैदर्भ्याः अलाभात् कृतगमनमनःप्राणवाञ्छाम्, सततधृतवयस्यानुकाराभिः आभिः (सखीभिः सह) विद्याः संशिक्ष्य, विजघ्नुः ।
Summary
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She (Damayanti), made by the kings into a personified deity of compassion, had her father, upon request, immediately give her suitable friends to them. And those kings, due to their failure to win Damayanti, suppressed their desire to depart by learning various arts with these friends, who constantly imitated Damayanti.
पदच्छेदः
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| भूभृद्भिः | भूभृत् (३.३) | by the kings |
| लम्भिता | लम्भित (√लभ्+णिच्+क्त, १.१) | made to attain |
| असौ | अदस् (१.१) | she |
| करुणरसनदी | करुणरस–नदी | river of the sentiment of compassion |
| मूर्तिमद्देवतात्वम् | मूर्तिमद्देवतात्व (२.१) | the state of being the personified deity |
| तातेन | तात (३.१) | by her father |
| अभ्यर्थ्य | अभ्यर्थ्य (अभि√अर्थ्+ल्यप्) | having requested |
| योग्याः | योग्य (२.३) | suitable |
| सपदि | सपदि | immediately |
| निजसखीः | निजसखी (२.३) | her own friends |
| दापयामास | दापयामास (√दा +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | caused to be given |
| तेभ्यः | तद् (४.३) | to them |
| वैदर्भ्याः | वैदर्भी (६.१) | of Damayanti |
| ते | तद् (१.३) | they |
| अपि | अपि | also |
| अलाभात् | अलाभ (५.१) | from the non-attainment |
| कृतगमनमनःप्राणवाञ्छाम् | कृत–गमन–मनस्–प्राण–वाञ्छा (२.१) | the desire of their minds and lives to depart |
| विजघ्नुः | विजघ्नुः (वि√हन् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they suppressed |
| सख्यः | सखि (१.३) | the friends |
| संशिक्ष्य | संशिक्ष्य (सम्√शिक्ष्+ल्यप्) | having well-learned |
| विद्याः | विद्या (२.३) | the arts |
| सततधृतवयस्यानुकाराभिः | सतत–धृत–वयस्या–अनुकार (३.३) | by those who constantly imitated their friend |
| आभिः | इदम् (३.३) | by these |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | भृ | द्भि | र्ल | म्भि | ता | ऽसौ | क | रु | ण | र | स | न | दी | मू | र्ति | म | द्दे | व | ता | त्वं |
| ता | ते | ना | भ्य | र्थ्य | यो | ग्याः | स | प | दि | नि | ज | स | खी | र्दा | प | या | मा | स | ते | भ्यः |
| वै | द | र्भ्या | स्ते | ऽप्य | ला | भा | त्कृ | त | ग | म | न | म | नः | प्रा | ण | वा | ञ्छां | वि | ज | घ्नुः |
| स | ख्यः | सं | शि | क्ष्य | वि | द्याः | स | त | त | धृ | त | व | य | स्या | नु | का | रा | भि | रा | भिः |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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