कूटकायमपहाय नो वपु-
र्बिभ्रतस्त्वमसि वीक्ष्य विस्मिता ।
आप्तुमाकृतिमतो मनीषितां
विद्यया हृदि तवाप्युदीयताम् ॥
कूटकायमपहाय नो वपु-
र्बिभ्रतस्त्वमसि वीक्ष्य विस्मिता ।
आप्तुमाकृतिमतो मनीषितां
विद्यया हृदि तवाप्युदीयताम् ॥
र्बिभ्रतस्त्वमसि वीक्ष्य विस्मिता ।
आप्तुमाकृतिमतो मनीषितां
विद्यया हृदि तवाप्युदीयताम् ॥
अन्वयः
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कूटकायम् अपहाय नः वपुः बिभ्रतः (अस्मान्) वीक्ष्य त्वम् विस्मिता असि । अतः मनीषिताम् आकृतिम् आप्तुम् तव हृदि अपि विद्यया उदीयताम् ।
Summary
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"You are astonished seeing us, who have abandoned our deceptive bodies and are bearing our own forms. Therefore, may the special knowledge to obtain any desired form also arise in your heart."
पदच्छेदः
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| कूटकायम् | कूटकाय (२.१) | the deceptive body |
| अपहाय | अपहाय (अप√हा+ल्यप्) | having abandoned |
| नः | अस्मद् (२.३) | us |
| वपुः | वपुस् (२.१) | true form |
| बिभ्रतः | बिभ्रत् (√भृ+शतृ, २.३) | bearing |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | are |
| वीक्ष्य | वीक्ष्य (वि√ईक्ष्+ल्यप्) | having seen |
| विस्मिता | विस्मित (वि√स्मि+क्त, १.१) | astonished |
| आप्तुम् | आप्तुम् (√आप्+तुमुन्) | to obtain |
| आकृतिम् | आकृति (२.१) | form |
| अतः | अतः | therefore |
| मनीषिताम् | मनीषित (२.१) | desired |
| विद्यया | विद्या (३.१) | by a special knowledge |
| हृदि | हृद् (७.१) | in the heart |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अपि | अपि | also |
| उदीयताम् | उदीयताम् (उद्√इ भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | let it arise |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कू | ट | का | य | म | प | हा | य | नो | व | पु |
| र्बि | भ्र | त | स्त्व | म | सि | वी | क्ष्य | वि | स्मि | ता |
| आ | प्तु | मा | कृ | ति | म | तो | म | नी | षि | तां |
| वि | द्य | या | हृ | दि | त | वा | प्यु | दी | य | ताम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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