प्रसादमासाद्य सुरैः कृतं सा
सस्मार सारस्वतसूक्तिसृष्टेः ।
देवा हि नान्यद्वितरन्ति किंतु
प्रसद्य ते साधुधियं ददन्ते ॥
प्रसादमासाद्य सुरैः कृतं सा
सस्मार सारस्वतसूक्तिसृष्टेः ।
देवा हि नान्यद्वितरन्ति किंतु
प्रसद्य ते साधुधियं ददन्ते ॥
सस्मार सारस्वतसूक्तिसृष्टेः ।
देवा हि नान्यद्वितरन्ति किंतु
प्रसद्य ते साधुधियं ददन्ते ॥
अन्वयः
AI
सुरैः कृतं प्रसादम् आसाद्य सा सारस्वत-सूक्ति-सृष्टेः सस्मार । हि देवाः अन्यत् न वितरन्ति, किन्तु ते प्रसद्य साधु-धियं ददन्ते ।
Summary
AI
Having received the grace bestowed by the gods, she recalled the creation of Saraswati's fine sayings. For gods do not grant anything else; rather, upon being pleased, they bestow righteous intellect.
पदच्छेदः
AI
| प्रसादम् | प्रसाद (२.१) | grace |
| आसाद्य | आसाद्य (आ√सद्+ल्यप्) | having received |
| सुरैः | सुर (३.३) | by the gods |
| कृतम् | कृत (√कृ+क्त, २.१) | bestowed |
| सा | तद् (१.१) | she |
| सस्मार | सस्मार (√स्मृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | recalled |
| सारस्वतसूक्तिसृष्टेः | सारस्वत–सूक्ति–सृष्टि (६.१) | of the creation of Saraswati's fine sayings |
| देवाः | देव (१.३) | gods |
| हि | हि | for |
| न | न | not |
| अन्यत् | अन्य (२.१) | anything else |
| वितरन्ति | वितरन्ति (वि√तृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | grant |
| किंतु | किंतु | but |
| प्रसद्य | प्रसद्य (प्र√सद्+ल्यप्) | having been pleased |
| ते | तद् (१.३) | they |
| साधुधियम् | साधु–धी (२.१) | righteous intellect |
| ददन्ते | ददन्ते (√दा कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | bestow |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | सा | द | मा | सा | द्य | सु | रैः | कृ | तं | सा |
| स | स्मा | र | सा | र | स्व | त | सू | क्ति | सृ | ष्टेः |
| दे | वा | हि | ना | न्य | द्वि | त | र | न्ति | किं | तु |
| प्र | स | द्य | ते | सा | धु | धि | यं | द | द | न्ते |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.