अन्वयः
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शुचिभानुना प्रसारितापः मरुः समुद्रत्वम् अपि प्रपद्य भवत् मनस्कार लव उद्गमेन पुरा इव क्रमेलकानाम् निलयः अस्तु ।
Summary
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Let the desert, its waters spread out by the sun, having attained the state of an ocean, become an abode for camels as before, merely by the arising of a fraction of your thought.
पदच्छेदः
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| प्रसारितापः | प्रसारित (प्र√सृ+णिच्+क्त)–अप् (१.१) | whose waters are spread out |
| शुचिभानुना | शुचिभानु (३.१) | by the sun |
| अस्तु | अस्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it be |
| मरुः | मरु (१.१) | the desert |
| समुद्रत्वम् | समुद्रत्व (२.१) | the state of being an ocean |
| अपि | अपि | even |
| प्रपद्य | प्रपद्य (प्र√पद्+ल्यप्) | having attained |
| भवत् | भवत् (६.१) | your |
| मनस्कार | मनस्कार | thought |
| लव | लव | a fraction |
| उद्गमेन | उद्गम (३.१) | by the arising of |
| क्रमेलकानाम् | क्रमेलक (६.३) | of camels |
| निलयः | निलय (१.१) | an abode |
| पुरा | पुरा | as before |
| इव | इव | like |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | सा | रि | ता | पः | शु | चि | भा | नु | ना | स्तु |
| म | रुः | स | मु | द्र | त्व | म | पि | प्र | प | द्य |
| भ | व | न्म | न | स्का | र | ल | वो | द्ग | मे | न |
| क्र | मे | ल | का | नां | नि | ल | यः | पु | रे | व |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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