सर्वाणि शस्त्राणि तवाङ्गचक्रै-
राविर्भवन्तु त्वयि शत्रुजैत्रे ।
अवाप्यमस्मादधिकं न किंचि-
ज्जागर्ति वीरव्रतदीक्षितानाम् ॥
सर्वाणि शस्त्राणि तवाङ्गचक्रै-
राविर्भवन्तु त्वयि शत्रुजैत्रे ।
अवाप्यमस्मादधिकं न किंचि-
ज्जागर्ति वीरव्रतदीक्षितानाम् ॥
राविर्भवन्तु त्वयि शत्रुजैत्रे ।
अवाप्यमस्मादधिकं न किंचि-
ज्जागर्ति वीरव्रतदीक्षितानाम् ॥
अन्वयः
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शत्रु-जैत्रे त्वयि तव अङ्ग-चक्रैः (सह) सर्वाणि शस्त्राणि आविर्भवन्तु । वीर-व्रत-दीक्षितानाम् अस्मात् अधिकम् किंचित् अवाप्यम् न जागर्ति ।
Summary
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Yama continued: "May all weapons manifest themselves on your limbs when you are conquering enemies. For those initiated into the vow of a hero, there exists nothing greater to be obtained than this."
पदच्छेदः
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| सर्वाणि | सर्व (१.३) | all |
| शस्त्राणि | शस्त्र (१.३) | weapons |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| अङ्गचक्रैः | अङ्ग–चक्र (३.३) | with the multitude of limbs |
| आविर्भवन्तु | आविर्भवन्तु (आविस्√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | may they appear |
| त्वयि | युष्मद् (७.१) | in you |
| शत्रुजैत्रे | शत्रुजैत्र (७.१) | the conqueror of enemies |
| अवाप्यम् | अवाप्य (अव√आप्+ण्यत्, १.१) | to be obtained |
| अस्मात् | इदम् (५.१) | than this |
| अधिकम् | अधिक (१.१) | greater |
| न | न | not |
| किंचित् | किंचित् (१.१) | anything |
| जागर्ति | जागर्ति (√जागृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | exists |
| वीरव्रतदीक्षितानाम् | वीर–व्रत–दीक्षित (६.३) | of those initiated into the vow of a hero |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | र्वा | णि | श | स्त्रा | णि | त | वा | ङ्ग | च | क्रै |
| रा | वि | र्भ | व | न्तु | त्व | यि | श | त्रु | जै | त्रे |
| अ | वा | प्य | म | स्मा | द | धि | कं | न | किं | चि |
| ज्जा | ग | र्ति | वी | र | व्र | त | दी | क्षि | ता | नाम् |
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