स्तम्भस्तथालम्भितमां नलेन
भैमीकरस्पर्शमुदः प्रसादः ।
कंदर्पलक्ष्यीकरणार्पितस्य
स्तम्भस्य दम्भं स चिरं यथापत् ॥
स्तम्भस्तथालम्भितमां नलेन
भैमीकरस्पर्शमुदः प्रसादः ।
कंदर्पलक्ष्यीकरणार्पितस्य
स्तम्भस्य दम्भं स चिरं यथापत् ॥
भैमीकरस्पर्शमुदः प्रसादः ।
कंदर्पलक्ष्यीकरणार्पितस्य
स्तम्भस्य दम्भं स चिरं यथापत् ॥
अन्वयः
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भैमी-कर-स्पर्श-मुदः प्रसादः स्तम्भः नलेन तथा तमाम् आलम्भि, यथा सः कंदर्प-लक्ष्यीकरण-अर्पितस्य स्तम्भस्य दम्भं चिरम् आपत् ।
Summary
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The gift of joy from touching Damayanti's hand, the state of being stunned (stambha), was so greatly experienced by Nala that for a long time he assumed the appearance of a pillar set up by Kamadeva as a target.
पदच्छेदः
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| स्तम्भः | स्तम्भ (१.१) | paralysis |
| तथा | तथा | so |
| आलम्भि | आलम्भि (आ√लभ् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was obtained |
| तमाम् | तमाम् | greatly |
| नलेन | नल (३.१) | by Nala |
| भैमीकरस्पर्शमुदः | भैमी–कर–स्पर्श–मुद् (६.१) | of the joy from touching Bhaimi's hand |
| प्रसादः | प्रसाद (१.१) | the gift |
| कंदर्पलक्ष्यीकरणार्पितस्य | कंदर्प–लक्ष्यीकरण–अर्पित (√ऋ+णिच्+क्त, ६.१) | of the one offered as a target by Kamadeva |
| स्तम्भस्य | स्तम्भ (६.१) | of a pillar |
| दम्भं | दम्भ (२.१) | the pretense |
| सः | तद् (१.१) | he |
| चिरं | चिरम् | for a long time |
| यथा | यथा | as |
| आपत् | आपत् (√आप् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | obtained |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्त | म्भ | स्त | था | ल | म्भि | त | मां | न | ले | न |
| भै | मी | क | र | स्प | र्श | मु | दः | प्र | सा | दः |
| कं | द | र्प | ल | क्ष्यी | क | र | णा | र्पि | त | स्य |
| स्त | म्भ | स्य | द | म्भं | स | चि | रं | य | था | पत् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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