रोमाणि सर्वाण्यपि बालभावा-
द्वरश्रियं वीक्षितुमुत्सुकानि ।
तस्यास्तदा कण्टकिताङ्गयष्टे-
रुद्ग्रीविकादानमिवान्वभूवन् ॥
रोमाणि सर्वाण्यपि बालभावा-
द्वरश्रियं वीक्षितुमुत्सुकानि ।
तस्यास्तदा कण्टकिताङ्गयष्टे-
रुद्ग्रीविकादानमिवान्वभूवन् ॥
द्वरश्रियं वीक्षितुमुत्सुकानि ।
तस्यास्तदा कण्टकिताङ्गयष्टे-
रुद्ग्रीविकादानमिवान्वभूवन् ॥
अन्वयः
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तदा बाल-भावात् वर-श्रियं वीक्षितुम् उत्सुकानि सर्वाणि अपि रोमाणि तस्याः कण्टकित-अङ्ग-यष्टेः उद्ग्रीविका-दानम् इव अन्वभूवन् ।
Summary
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Then, all the hairs on her slender, horripilated body, eager to see the groom's beauty but hindered by their smallness, seemed to be stretching their necks upwards as if to get a better view.
पदच्छेदः
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| रोमाणि | रोमन् (१.३) | the hairs |
| सर्वाणि | सर्व (१.३) | all |
| अपि | अपि | even |
| बालभावात् | बाल–भाव (५.१) | due to their smallness |
| वरश्रियं | वर–श्री (२.१) | the beauty of the groom |
| वीक्षितुम् | वीक्षितुम् (वि√ईक्ष्+तुमुन्) | to see |
| उत्सुकानि | उत्सुक (१.३) | eager |
| तस्याः | तद् (६.१) | her |
| तदा | तदा | then |
| कण्टकिताङ्गयष्टेः | कण्टकित–अङ्ग–यष्टि (६.१) | of her whose slender body had horripilated |
| उद्ग्रीविकादानम् | उद्ग्रीविका–दान (२.१) | the act of stretching the neck |
| इव | इव | as if |
| अन्वभूवन् | अन्वभूवन् (अनु√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | experienced |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रो | मा | णि | स | र्वा | ण्य | पि | बा | ल | भा | वा |
| द्व | र | श्रि | यं | वी | क्षि | तु | मु | त्सु | का | नि |
| त | स्या | स्त | दा | क | ण्ट | कि | ता | ङ्ग | य | ष्टे |
| रु | द्ग्री | वि | का | दा | न | मि | वा | न्व | भू | वन् |
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