कापि प्रमोदास्फुटनिर्जिहान-
वर्णेव या मङ्गलगीतिरासाम् ।
सैवाननेभ्यः पुरसुन्दरीणा-
मुच्चैरुलूलुध्वनिरुच्चचार ॥
कापि प्रमोदास्फुटनिर्जिहान-
वर्णेव या मङ्गलगीतिरासाम् ।
सैवाननेभ्यः पुरसुन्दरीणा-
मुच्चैरुलूलुध्वनिरुच्चचार ॥
वर्णेव या मङ्गलगीतिरासाम् ।
सैवाननेभ्यः पुरसुन्दरीणा-
मुच्चैरुलूलुध्वनिरुच्चचार ॥
अन्वयः
AI
आसाम् या का अपि मङ्गल-गीतिः प्रमोद-अस्फुट-निर्जिहान-वर्णा इव (आसीत्), सा एव उलूलु-ध्वनिः पुर-सुन्दरीणाम् आननेभ्यः उच्चैः उच्चचार ।
Summary
AI
What seemed like an auspicious song, its letters emerging indistinctly due to overwhelming joy, arose from the mouths of the beautiful city ladies as a loud sound of ululation.
पदच्छेदः
AI
| कापि | का (१.१)–अपि | some |
| प्रमोदास्फुटनिर्जिहानवर्णा | प्रमोद–अस्फुट–निर्जिहान–वर्ण (१.१) | whose letters were indistinctly emerging due to joy |
| इव | इव | like |
| या | यद् (१.१) | which |
| मङ्गलगीतिः | मङ्गल–गीति (१.१) | auspicious song |
| आसाम् | इदम् (६.३) | of these |
| सा | तद् (१.१) | that |
| एव | एव | itself |
| आननेभ्यः | आनन (५.३) | from the mouths |
| पुरसुन्दरीणाम् | पुर–सुन्दरी (६.३) | of the beautiful ladies of the city |
| उच्चैः | उच्चैस् | loudly |
| उलूलुध्वनिः | उलूलु–ध्वनि (१.१) | the sound of ululation |
| उच्चचार | उच्चचार (उत्√चर् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | arose |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | पि | प्र | मो | दा | स्फु | ट | नि | र्जि | हा | न |
| व | र्णे | व | या | म | ङ्ग | ल | गी | ति | रा | साम् |
| सै | वा | न | ने | भ्यः | पु | र | सु | न्द | री | णा |
| मु | च्चै | रु | लू | लु | ध्व | नि | रु | च्च | चा | र |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.