भैम्या स्रजःसञ्जनया पथि प्रा-
क्स्वयंवरं संजनयांबभूव ।
संभोगमालिङ्गनयास्य वेधाः
शेषं तु कं हन्तुमियद्यतध्वे ॥
भैम्या स्रजःसञ्जनया पथि प्रा-
क्स्वयंवरं संजनयांबभूव ।
संभोगमालिङ्गनयास्य वेधाः
शेषं तु कं हन्तुमियद्यतध्वे ॥
क्स्वयंवरं संजनयांबभूव ।
संभोगमालिङ्गनयास्य वेधाः
शेषं तु कं हन्तुमियद्यतध्वे ॥
अन्वयः
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वेधाः प्राक् पथि भैम्या स्रजः सञ्जनया स्वयम्बरं संजनयांबभूव । अस्य आलिङ्गनया संभोगं (संजनयांबभूव) । तु शेषं कं हन्तुम् इयत् यतध्वे?
Summary
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The Creator already orchestrated the svayamvara on the path through Damayanti's act of placing the garland, and He created their union through her embrace. Why then do you strive so hard to destroy what remains?
पदच्छेदः
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| भैम्या | भैमी (३.१) | by Bhaimi |
| स्रजः | स्रज् (२.१) | garland's |
| सञ्जनया | सञ्जनि (सम्√जन्+णिच्+अ, ३.१) | by the act of creating |
| पथि | पथिन् (७.१) | on the path |
| प्राक् | प्राक् | before |
| स्वयंवरम् | स्वयंवर (२.१) | the svayamvara |
| संजनयांबभूव | संजनयांबभूव (सम्√जन् +णिच् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | created |
| संभोगम् | संभोग (२.१) | union |
| आलिङ्गनया | आलिङ्गन (३.१) | by the embrace |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| वेधाः | वेधस् (१.१) | the Creator |
| शेषम् | शेष (२.१) | the remainder |
| तु | तु | but |
| कम् | किम् (२.१) | what |
| हन्तुम् | हन्तुम् (√हन्+तुमुन्) | to destroy |
| इयत् | इयत् | so much |
| यतध्वे | यतध्वे (√यत् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. बहु.) | you strive |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भै | म्या | स्र | जः | स | ञ्ज | न | या | प | थि | प्रा |
| क्स्व | यं | व | रं | सं | ज | न | यां | ब | भू | व |
| सं | भो | ग | मा | लि | ङ्ग | न | या | स्य | वे | धाः |
| शे | षं | तु | कं | ह | न्तु | मि | य | द्य | त | ध्वे |
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