हसत्सु भैमीं दिविषत्सु पाणौ
पाणिम्प्रणीयाप्सरसां रसात्सा ।
आलिङ्ग्य नीत्वाकृत पान्थदुर्गां
भूपालदिक्पालकुलाध्वमध्यम् ॥
हसत्सु भैमीं दिविषत्सु पाणौ
पाणिम्प्रणीयाप्सरसां रसात्सा ।
आलिङ्ग्य नीत्वाकृत पान्थदुर्गां
भूपालदिक्पालकुलाध्वमध्यम् ॥
पाणिम्प्रणीयाप्सरसां रसात्सा ।
आलिङ्ग्य नीत्वाकृत पान्थदुर्गां
भूपालदिक्पालकुलाध्वमध्यम् ॥
अन्वयः
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दिविषत्सु भैमीम् हसत्सु (सत्सु), सा अप्सरसाम् पाणौ पाणिम् प्रणीय, रसात् आलिङ्ग्य नीत्वा, भूपाल-दिक्पाल-कुल-अध्व-मध्यम् पान्थ-दुर्गाम् अकृत ।
Summary
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While the gods were laughing at Damayanti, she (Sarasvati), placing her hand in the hands of the Apsaras, affectionately embraced and led her, making the path between the groups of kings and guardian deities difficult for her to traverse.
पदच्छेदः
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| हसत्सु | हसत् (√हस्+शतृ, ७.३) | while laughing |
| भैमीम् | भैमी (२.१) | at Damayanti |
| दिविषत्सु | दिविषद् (७.३) | the gods |
| पाणौ | पाणि (७.१) | in the hand |
| पाणिम् | पाणि (२.१) | hand |
| प्रणीय | प्रणीय (प्र√नी+ल्यप्) | having placed |
| अप्सरसाम् | अप्सरस् (६.३) | of the Apsaras |
| रसात् | रस (५.१) | with affection |
| सा | तद् (१.१) | she (Sarasvati) |
| आलिङ्ग्य | आलिङ्ग्य (आ√लिङ्ग्+ल्यप्) | having embraced |
| नीत्वा | नीत्वा (√नी+क्त्वा) | having led |
| अकृत | अकृत (√कृ कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | made |
| पान्थदुर्गाम् | पान्थ–दुर्गा (२.१) | difficult for a traveler |
| भूपालदिक्पालकुलाध्वमध्यम् | भूपाल–दिक्पाल–कुल–अध्व–मध्य (२.१) | the middle of the path between the groups of kings and guardian deities |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | स | त्सु | भै | मीं | दि | वि | ष | त्सु | पा | णौ |
| पा | णि | म्प्र | णी | या | प्स | र | सां | र | सा | त्सा |
| आ | लि | ङ्ग्य | नी | त्वा | कृ | त | पा | न्थ | दु | र्गां |
| भू | पा | ल | दि | क्पा | ल | कु | ला | ध्व | म | ध्यम् |
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