स्रजा समालिङ्गयितुं प्रियं सा
रसादधत्तैव बहुप्रयत्नम् ।
स्तम्भत्रपाभ्यामभवत्तदीये
स्पन्दस्तु मन्दोऽपि न पाणिपद्मे ॥
स्रजा समालिङ्गयितुं प्रियं सा
रसादधत्तैव बहुप्रयत्नम् ।
स्तम्भत्रपाभ्यामभवत्तदीये
स्पन्दस्तु मन्दोऽपि न पाणिपद्मे ॥
रसादधत्तैव बहुप्रयत्नम् ।
स्तम्भत्रपाभ्यामभवत्तदीये
स्पन्दस्तु मन्दोऽपि न पाणिपद्मे ॥
अन्वयः
AI
सा प्रियम् स्रजा समालिङ्गयितुम् रसात् बहु-प्रयत्नम् अधत्त एव । तु स्तम्भ-त्रपाभ्याम् तदीये पाणि-पद्मे मन्दः स्पन्दः अपि न अभवत् ।
Summary
AI
Out of love, she indeed made a great effort to embrace her beloved with the garland. But, due to being paralyzed by shyness, there was not even a slight movement in her lotus-like hand.
पदच्छेदः
AI
| स्रजा | स्रज् (३.१) | with the garland |
| समालिङ्गयितुम् | समालिङ्गयितुम् (सम्+आ√लिङ्ग्+तुमुन्) | to embrace |
| प्रियम् | प्रिय (२.१) | her beloved |
| सा | तद् (१.१) | she |
| रसात् | रस (५.१) | out of love |
| अधत्त | अधत्त (√धा कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | made |
| एव | एव | indeed |
| बहुप्रयत्नम् | बहु–प्रयत्न (२.१) | great effort |
| स्तम्भत्रपाभ्याम् | स्तम्भ–त्रपा (३.२) | due to paralysis and shyness |
| अभवत् | अभवत् (√भू कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was |
| तदीये | तदीय (७.१) | in her |
| स्पन्दः | स्पन्द (१.१) | movement |
| तु | तु | but |
| मन्दः | मन्द (१.१) | slight |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| पाणिपद्मे | पाणि–पद्म (७.१) | in her lotus-like hand |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्र | जा | स | मा | लि | ङ्ग | यि | तुं | प्रि | यं | सा |
| र | सा | द | ध | त्तै | व | ब | हु | प्र | य | त्नम् |
| स्त | म्भ | त्र | पा | भ्या | म | भ | व | त्त | दी | ये |
| स्प | न्द | स्तु | म | न्दो | ऽपि | न | पा | णि | प | द्मे |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.