सा भङ्गिरस्याः खलु वाचि कापि
यद्भारती मूर्तिमतीयमेव ।
श्लिष्टं निगद्यादृत वासवादी-
न्विशिष्य मे नैषधमप्यवादीत् ॥
सा भङ्गिरस्याः खलु वाचि कापि
यद्भारती मूर्तिमतीयमेव ।
श्लिष्टं निगद्यादृत वासवादी-
न्विशिष्य मे नैषधमप्यवादीत् ॥
यद्भारती मूर्तिमतीयमेव ।
श्लिष्टं निगद्यादृत वासवादी-
न्विशिष्य मे नैषधमप्यवादीत् ॥
अन्वयः
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अस्याः वाचि सा का अपि भङ्गिः खलु (अस्ति) यत् इयम् मूर्तिमती भारती एव । (सा) श्लिष्टं निगद्य वासवादीन् आदृता (सती) मे विशिष्य नैषधम् अपि अवादीत् ।
Summary
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(Damayanti's heart thinks:) "There is indeed some unique charm in her (Saraswati's) speech, for she is the goddess of speech incarnate. Having spoken ambiguously, she paid respect to Indra and the other gods, but she also spoke specifically to me about Nala."
पदच्छेदः
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| सा | तद् (१.१) | that |
| भङ्गिः | भङ्गि (१.१) | charm |
| अस्याः | इदम् (६.१) | her |
| खलु | खलु | indeed |
| वाचि | वाच् (७.१) | in the speech |
| कापि | किम् (१.१)–अपि | some unique |
| यत् | यत् | that |
| भारती | भारती (१.१) | Saraswati |
| मूर्तिमती | मूर्तिमत् (१.१) | incarnate |
| इयमेव | इदम् (१.१)–एव | is this very one |
| श्लिष्टम् | श्लिष्ट (√श्लिष्+क्त, २.१) | ambiguously |
| निगद्य | निगद्य (नि√गद्+ल्यप्) | having spoken |
| आदृत | आदृत (आ√दृ+क्त, १.१) | respected |
| वासवादीन् | वासव–आदि (२.३) | Indra and others |
| विशिष्य | विशिष्य (वि√शिष्+ल्यप्) | specifically |
| मे | अस्मद् (४.१) | to me |
| नैषधम् | नैषध (२.१) | about Nala |
| अपि | अपि | also |
| अवादीत् | अवादीत् (√वद् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | spoke |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | भ | ङ्गि | र | स्याः | ख | लु | वा | चि | का | पि |
| य | द्भा | र | ती | मू | र्ति | म | ती | य | मे | व |
| श्लि | ष्टं | नि | ग | द्या | दृ | त | वा | स | वा | दी |
| न्वि | शि | ष्य | मे | नै | ष | ध | म | प्य | वा | दीत् |
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