श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातस्तस्य चतुर्दशः शरदिजज्योत्स्नाच्छसूक्तेः महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहर्षं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातस्तस्य चतुर्दशः शरदिजज्योत्स्नाच्छसूक्तेः महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
यातस्तस्य चतुर्दशः शरदिजज्योत्स्नाच्छसूक्तेः महा-
काव्ये चारुणि नैषधीयचरिते सर्गो निसर्गोज्ज्वलः ॥
अन्वयः
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कविराजराजि मुकुटालङ्कार हीरः श्रीहीरः च मामल्लदेवी च जितेन्द्रियचयम् यम् श्रीहर्षम् सुतम् सुषुवे, तस्य शरदिज ज्योत्स्ना अच्छ सूक्तेः चारुणि नैषधीयचरिते महाकाव्ये निसर्गोज्ज्वलः चतुर्दशः सर्गः यातः ।
Summary
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Here concludes the naturally brilliant fourteenth canto of the beautiful epic poem, Naishadhiyacharita, composed by Sriharsha—whose sayings are as clear as autumnal moonlight, and whom Srihira, the diamond ornamenting the crowns of the best poets, and Mamalladevi gave birth to as a son who had conquered his senses.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षम् | श्रीहर्ष (२.१) | Sriharsha |
| कविराजराजि | कविराज–राजि | of the rows of best poets |
| मुकुटालङ्कार | मुकुट–अलङ्कार | crown ornament |
| हीरः | हीर (१.१) | the diamond |
| सुतम् | सुत (२.१) | son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Srihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√षू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयम् | जितेन्द्रियचय (२.१) | who had conquered his senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| यातः | यात (√या+क्त, १.१) | has concluded |
| तस्य | तद् (६.१) | of that (poet) |
| चतुर्दशः | चतुर्दश (१.१) | the fourteenth |
| शरदिज | शरदिज | autumnal |
| ज्योत्स्ना | ज्योत्स्ना | moonlight |
| अच्छ | अच्छ | clear |
| सूक्तेः | सूक्ति (६.१) | of the one with beautiful sayings |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | in the great epic poem |
| चारुणि | चारु (७.१) | in the beautiful |
| नैषधीयचरिते | नैषधीयचरित (७.१) | in the Naishadhiyacharita |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| निसर्गोज्ज्वलः | निसर्गोज्ज्वल (१.१) | naturally brilliant |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्षं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| या | त | स्त | स्य | च | तु | र्द | शः | श | र | दि | ज | ज्यो | त्स्ना | च्छ | सू | क्तेः | म | हा |
| का | व्ये | चा | रु | णि | नै | ष | धी | य | च | रि | ते | स | र्गो | नि | स | र्गो | ज्ज्व | लः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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