श्रीहर्शं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
स्वादूत्पादभृति त्रयोदशतयादेश्यस्तदीये महा-
काव्येऽयं व्यरमन्नलस्य चरिते सर्गो रसाम्भोनिधिः ॥
श्रीहर्शं कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः सुतं
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
स्वादूत्पादभृति त्रयोदशतयादेश्यस्तदीये महा-
काव्येऽयं व्यरमन्नलस्य चरिते सर्गो रसाम्भोनिधिः ॥
श्रीहीरः सुषुवे जितेन्द्रियचयं मामल्लदेवी च यम् ।
स्वादूत्पादभृति त्रयोदशतयादेश्यस्तदीये महा-
काव्येऽयं व्यरमन्नलस्य चरिते सर्गो रसाम्भोनिधिः ॥
अन्वयः
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कवि-राज-राजि-मुकुट-अलंकार-हीरः श्रीहीरः मामल्लदेवी च जित-इन्द्रिय-चयं यं सुतं श्रीहर्षं सुषुवे, तदीये नलस्य चरिते महाकाव्ये स्वादु-उत्पाद-भृति रस-अम्भोनिधिः अयं सर्गः त्रयोदशतया आदेश्यः वि अरमत् ।
Summary
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Shri Hira, the diamond ornament on the crowns of the assembly of kingly poets, and Mamalladevi gave birth to a son, Shri Harsha, who had conquered his senses. In his great poem, the life of Nala, this thirteenth canto, an ocean of aesthetic delight and a bearer of sweetness, has now concluded.
पदच्छेदः
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| श्रीहर्षं | श्रीहर्ष (२.१) | Shriharsha |
| कविराजराजिमुकुटालंकारहीरः | कविराज–राजि–मुकुट–अलंकार–हीर (१.१) | the diamond ornament on the crowns of the assembly of kingly poets |
| सुतं | सुत (२.१) | the son |
| श्रीहीरः | श्रीहीर (१.१) | Shrihira |
| सुषुवे | सुषुवे (√सू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gave birth to |
| जितेन्द्रियचयं | जित–इन्द्रिय–चय (२.१) | who had conquered his senses |
| मामल्लदेवी | मामल्लदेवी (१.१) | Mamalladevi |
| च | च | and |
| यम् | यद् (२.१) | whom |
| स्वादूत्पादभृति | स्वादु–उत्पाद–भृति (१.१) | bearer of sweetness |
| त्रयोदशतयादेश्यः | त्रयोदशतया–आदेश्य (१.१) | to be known as the thirteenth |
| तदीये | तदीय (७.१) | in his |
| महाकाव्ये | महाकाव्य (७.१) | great poem |
| अयं | इदम् (१.१) | this |
| व्यरमत् | व्यरमत् (वि√रम् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | has concluded |
| नलस्य | नल (६.१) | of Nala |
| चरिते | चरित (७.१) | in the life |
| सर्गः | सर्ग (१.१) | canto |
| रसाम्भोनिधिः | रस–अम्भोनिधि (१.१) | an ocean of aesthetic delight |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्री | ह | र्शं | क | वि | रा | ज | रा | जि | मु | कु | टा | लं | का | र | ही | रः | सु | तं |
| श्री | ही | रः | सु | षु | वे | जि | ते | न्द्रि | य | च | यं | मा | म | ल्ल | दे | वी | च | यम् |
| स्वा | दू | त्पा | द | भृ | ति | त्र | यो | द | श | त | या | दे | श्य | स्त | दी | ये | म | हा |
| का | व्ये | ऽयं | व्य | र | म | न्न | ल | स्य | च | रि | ते | स | र्गो | र | सा | म्भो | नि | धिः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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