क्षोणीभृतामतुलकर्कशविग्रहाणा-
मुद्दामदर्पहरिकुञ्जरकोटिभाजाम् ।
पक्षच्छिदामयमुदग्रबलो विधाय
मग्नं विपज्जलनिधौ जगदुज्जहार ॥
क्षोणीभृतामतुलकर्कशविग्रहाणा-
मुद्दामदर्पहरिकुञ्जरकोटिभाजाम् ।
पक्षच्छिदामयमुदग्रबलो विधाय
मग्नं विपज्जलनिधौ जगदुज्जहार ॥
मुद्दामदर्पहरिकुञ्जरकोटिभाजाम् ।
पक्षच्छिदामयमुदग्रबलो विधाय
मग्नं विपज्जलनिधौ जगदुज्जहार ॥
अन्वयः
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अयम् उदग्र-बलः (सन्) अतुल-कर्कश-विग्रहाणाम् उद्दाम-दर्प-हरि-कुञ्जर-कोटि-भाजाम् क्षोणीभृताम् पक्ष-च्छिदाम् विधाय विपत्-जल-निधौ मग्नम् जगत् उज्जहार ।
Summary
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This king of eminent strength, by cutting the 'wings' (allies) of other 'mountains' (kings)—who possessed unequalled hard bodies and crores of fiercely proud lions and elephants—lifted up the world which was sunk in the ocean of calamity.
पदच्छेदः
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| क्षोणीभृताम् | क्षोणीभृत् (६.३) | of the mountains/kings |
| अतुल-कर्कश-विग्रहाणाम् | अतुल–कर्कश–विग्रह (६.३) | of those with unequalled hard bodies |
| उद्दाम-दर्प-हरि-कुञ्जर-कोटि-भाजाम् | उद्दाम–दर्प–हरि–कुञ्जर–कोटि–भाज् (६.३) | possessing crores of lions and elephants of unrestrained pride |
| पक्ष-च्छिदाम् | पक्ष–छिद् (२.१) | the cutting of wings/allies |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| उदग्र-बलः | उदग्र–बल (१.१) | one of eminent strength |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having performed |
| मग्नम् | मग्न (√मस्ज्+क्त, २.१) | sunken |
| विपत्-जल-निधौ | विपद्–जलनिधि (७.१) | in the ocean of calamity |
| जगत् | जगत् (२.१) | the world |
| उज्जहार | उज्जहार (उद्√हृ लिट् प्र.पु. एक.) | lifted up |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षो | णी | भृ | ता | म | तु | ल | क | र्क | श | वि | ग्र | हा | णा |
| मु | द्दा | म | द | र्प | ह | रि | कु | ञ्ज | र | को | टि | भा | जाम् |
| प | क्ष | च्छि | दा | म | य | मु | द | ग्र | ब | लो | वि | धा | य |
| म | ग्नं | वि | प | ज्ज | ल | नि | धौ | ज | ग | दु | ज्ज | हा | र |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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