उत्कण्ठयन्पृथगिमां युगपन्नलेषु
प्रत्येकमेषु परिमोहयमाणबाणः ।
जानीवहे निजशिलीमुखशीलिसंख्या-
साफल्यमाप स तदा यदि पञ्चबाणः ॥
उत्कण्ठयन्पृथगिमां युगपन्नलेषु
प्रत्येकमेषु परिमोहयमाणबाणः ।
जानीवहे निजशिलीमुखशीलिसंख्या-
साफल्यमाप स तदा यदि पञ्चबाणः ॥
प्रत्येकमेषु परिमोहयमाणबाणः ।
जानीवहे निजशिलीमुखशीलिसंख्या-
साफल्यमाप स तदा यदि पञ्चबाणः ॥
अन्वयः
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यदि सः पञ्चबाणः (आसीत्), तदा एषु नलेषु प्रत्येकं पृथक् युगपत् इमाम् उत्कण्ठयन् परिमोहयमाणबाणः (सन्) निजशिलीमुखशीलिसंख्यासाफल्यम् आप इति जानीवहे।
Summary
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If he was indeed the five-arrowed god (Kamadeva), then we understand that he achieved the fulfillment of the number of his arrows by simultaneously making her yearn for each of these Nalas separately, his arrows causing confusion for each one.
पदच्छेदः
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| उत्कण्ठयन् | उत्कण्ठयत् (उद्√कण्ठ्+णिच्+शतृ, १.१) | making yearn |
| पृथक् | पृथक् | separately |
| इमाम् | इदम् (२.१) | her |
| युगपत् | युगपत् | simultaneously |
| नलेषु | नल (७.३) | for the Nalas |
| प्रत्येकम् | प्रत्येकम् | for each one |
| एषु | एतद् (७.३) | these |
| परिमोहयमाणबाणः | परिमोहयमाणबाण (१.१) | one whose arrows were causing confusion |
| जानीवहे | जानीवहे (√ज्ञा कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. द्वि.) | we understand |
| निजशिलीमुखशीलिसंख्यासाफल्यम् | निजशिलीमुखशीलिसंख्यासाफल्य (२.१) | the fulfillment of the number of his arrows |
| आप | आप (√आप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | achieved |
| सः | तद् (१.१) | he |
| तदा | तदा | then |
| यदि | यदि | if |
| पञ्चबाणः | पञ्चबाण (१.१) | the five-arrowed one (Kamadeva) |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | त्क | ण्ठ | य | न्पृ | थ | गि | मां | यु | ग | प | न्न | ले | षु |
| प्र | त्ये | क | मे | षु | प | रि | मो | ह | य | मा | ण | बा | णः |
| जा | नी | व | हे | नि | ज | शि | ली | मु | ख | शी | लि | सं | ख्या |
| सा | फ | ल्य | मा | प | स | त | दा | य | दि | प | ञ्च | बा | णः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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