श्लोकादिह प्रथमतो हरिणा द्वितीया-
द्धूमध्वजेन शमनेन समं तृतीयात् ।
तुर्याच्च तस्य वरुणेन समानभावं
सा जानती पुनरवादि तया विमुग्धा ॥
श्लोकादिह प्रथमतो हरिणा द्वितीया-
द्धूमध्वजेन शमनेन समं तृतीयात् ।
तुर्याच्च तस्य वरुणेन समानभावं
सा जानती पुनरवादि तया विमुग्धा ॥
द्धूमध्वजेन शमनेन समं तृतीयात् ।
तुर्याच्च तस्य वरुणेन समानभावं
सा जानती पुनरवादि तया विमुग्धा ॥
अन्वयः
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इह प्रथमतः श्लोकात् हरिणा, द्वितीयात् धूमध्वजेन, तृतीयात् शमनेन समम्, तुर्यात् च वरुणेन तस्य समानभावं जानती सा विमुग्धा तया पुनः अवादि।
Summary
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Knowing his similarity—from the first verse with Indra, from the second with Agni, from the third with Yama, and from the fourth with Varuna—the bewildered Damayanti was again addressed by Saraswati.
पदच्छेदः
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| श्लोकात् | श्लोक (५.१) | from the verse |
| इह | इह | here |
| प्रथमतः | प्रथमतः | from the first |
| हरिणा | हरि (३.१) | with Indra |
| द्वितीयात् | द्वितीय (५.१) | from the second |
| धूमध्वजेन | धूमध्वज (३.१) | with Agni |
| शमनेन | शमन (३.१) | with Yama |
| समम् | समम् | with |
| तृतीयात् | तृतीय (५.१) | from the third |
| तुर्यात् | तुर्य (५.१) | from the fourth |
| च | च | and |
| तस्य | तद् (६.१) | his |
| वरुणेन | वरुण (३.१) | with Varuna |
| समानभावम् | समानभाव (२.१) | similarity |
| सा | तद् (१.१) | she |
| जानती | जानत् (√ज्ञा+शतृ, १.१) | knowing |
| पुनः | पुनर् | again |
| अवादि | अवादि (√वद् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was spoken to |
| तया | तद् (३.१) | by her (Saraswati) |
| विमुग्धा | विमुग्ध (१.१) | the bewildered one |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्लो | का | दि | ह | प्र | थ | म | तो | ह | रि | णा | द्वि | ती | या |
| द्धू | म | ध्व | जे | न | श | म | ने | न | स | मं | तृ | ती | यात् |
| तु | र्या | च्च | त | स्य | व | रु | णे | न | स | मा | न | भा | वं |
| सा | जा | न | ती | पु | न | र | वा | दि | त | या | वि | मु | ग्धा |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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