ब्रूमः किमस्य वरवर्णिनि वीरसेनो-
द्भूतिं द्विषद्बलविजित्वरपौरुषस्य ।
सेनाचरीभवदिभाननदानवारि-
वासेन यस्य जनितासुरभीरणश्रीः ॥
ब्रूमः किमस्य वरवर्णिनि वीरसेनो-
द्भूतिं द्विषद्बलविजित्वरपौरुषस्य ।
सेनाचरीभवदिभाननदानवारि-
वासेन यस्य जनितासुरभीरणश्रीः ॥
द्भूतिं द्विषद्बलविजित्वरपौरुषस्य ।
सेनाचरीभवदिभाननदानवारि-
वासेन यस्य जनितासुरभीरणश्रीः ॥
अन्वयः
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वरवर्णिनि, द्विषत्-बल-विजित्वर-पौरुषस्य, यस्य सेना-चरी-भवत्-इभ-आनन-दान-वारि-वासेन रण-श्रीः असुरभि जनिता, अस्य वीरसेन-उद्भूतिम् किम् ब्रूमः?
Summary
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"O beautiful lady, what can we say of this one, born of Virasena, whose prowess conquers enemy armies? The splendor of his battlefield is rendered foul-smelling by the overpowering fragrance of the ichor from the faces of his army's elephants."
पदच्छेदः
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| ब्रूमः | ब्रूमः (√ब्रू लट् उ.पु. बहु.) | we say |
| किम् | किम् (२.१) | what |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this one |
| वरवर्णिनि | वरवर्णिनि (८.१) | O beautiful lady |
| वीरसेन-उद्भूतिम् | वीरसेन–उद्भूति (२.१) | origin from Virasena |
| द्विषत्-बल-विजित्वर-पौरुषस्य | द्विषत्–बल–विजित्वर–पौरुष (६.१) | of him whose prowess is victorious over enemy armies |
| सेना-चरी-भवत्-इभ-आनन-दान-वारि-वासेन | सेना–चरीभवत्–इभ–आनन–दानवारि–वास (३.१) | by the fragrance of the ichor from the faces of the wandering elephants of his army |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| जनिता-असुरभि-रण-श्रीः | जनित (√जन्+क्त)–असुरभि–रण–श्री (१.१) | the splendor of whose battle is made unfragrant |
| रण-श्रीः | रण–श्री (१.१) | splendor of battle |
| असुरभि | असुरभि (१.१) | unfragrant |
| जनिता | जनित (√जन्+क्त, १.१) | is produced |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब्रू | मः | कि | म | स्य | व | र | व | र्णि | नि | वी | र | से | नो |
| द्भू | तिं | द्वि | ष | द्ब | ल | वि | जि | त्व | र | पौ | रु | ष | स्य |
| से | ना | च | री | भ | व | दि | भा | न | न | दा | न | वा | रि |
| वा | से | न | य | स्य | ज | नि | ता | सु | र | भी | र | ण | श्रीः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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