धूलीभिर्दिवमन्धयन्बधिरयन्नाशाः खुराणां रवै-
र्वातं संयति खञ्जयञ्जवजवैस्तोत्न्गुणैर्मूकयन् ।
धर्माराधनसंनियुक्तजगता राज्ञामुनाधिष्ठितः
सान्द्रोत्फालमिषाद्विगायति पदा स्प्रष्टुं तुरंगोऽपि गाम् ॥
धूलीभिर्दिवमन्धयन्बधिरयन्नाशाः खुराणां रवै-
र्वातं संयति खञ्जयञ्जवजवैस्तोत्न्गुणैर्मूकयन् ।
धर्माराधनसंनियुक्तजगता राज्ञामुनाधिष्ठितः
सान्द्रोत्फालमिषाद्विगायति पदा स्प्रष्टुं तुरंगोऽपि गाम् ॥
र्वातं संयति खञ्जयञ्जवजवैस्तोत्न्गुणैर्मूकयन् ।
धर्माराधनसंनियुक्तजगता राज्ञामुनाधिष्ठितः
सान्द्रोत्फालमिषाद्विगायति पदा स्प्रष्टुं तुरंगोऽपि गाम् ॥
अन्वयः
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संयति धूलीभिः दिवम् अन्धयन्, खुराणाम् रवैः आशाः बधिरयन्, जव-जवैः वातम् खञ्जयन्, गुणैः तोत्तॄन् मूकयन्, धर्म-आराधन-संनियुक्त-जगता अमुना राज्ञा अधिष्ठितः तुरंगः अपि सान्द्र-उत्फाल-मिषात् गाम् पदा स्प्रष्टुम् विगायति ।
Summary
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In battle, the horse blinds the sky with dust, deafens the directions with its hooves, lames the wind with its speed, and silences its rider with its virtues. Mounted by this king, who engages the world in dharma, even the horse, on the pretext of leaping, disdains to touch the earth with its feet.
पदच्छेदः
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| धूलीभिः | धूली (३.३) | with dusts |
| दिवम् | दिव् (२.१) | the sky |
| अन्धयन् | अन्धयत् (√अन्ध+णिच्+शतृ, १.१) | blinding |
| बधिरयन् | बधिरयत् (√बधिर+णिच्+शतृ, १.१) | deafening |
| आशाः | आशा (२.३) | the directions |
| खुराणां | खुर (६.३) | of the hooves |
| रवैः | रव (३.३) | with sounds |
| वातं | वात (२.१) | the wind |
| संयति | संयति (७.१) | in battle |
| खञ्जयन् | खञ्जयत् (√खञ्ज्+णिच्+शतृ, १.१) | making lame |
| जवजवैः | जवजव (३.३) | with its great speed |
| तोत्तॄन् | तोत्तृ (२.३) | the riders |
| गुणैः | गुण (३.३) | with virtues |
| मूकयन् | मूकयत् (√मूक+णिच्+शतृ, १.१) | making mute |
| धर्माराधनसंनियुक्तजगता | धर्म–आराधन–संनियुक्त–जगत् (३.१) | by the one who has engaged the world in the worship of dharma |
| राज्ञा | राजन् (३.१) | by the king |
| अमुना | अदस् (३.१) | by this |
| अधिष्ठितः | अधिष्ठित (अधि√स्था+क्त, १.१) | mounted |
| सान्द्रोत्फालमिषात् | सान्द्र–उत्फाल–मिष (५.१) | on the pretext of frequent leaping |
| विगायति | विगायति (वि√गै कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | disdains |
| पदा | पद (३.१) | with its foot |
| स्प्रष्टुं | स्प्रष्टुम् (√स्पृश्+तुमुन्) | to touch |
| तुरंगः | तुरङ्ग (१.१) | the horse |
| अपि | अपि | even |
| गाम् | गो (२.१) | the earth |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धू | ली | भि | र्दि | व | म | न्ध | य | न्ब | धि | र | य | न्ना | शाः | खु | रा | णां | र | वै |
| र्वा | तं | सं | य | ति | ख | ञ्ज | य | ञ्ज | व | ज | वै | स्तो | त्न्गु | णै | र्मू | क | यन् | |
| ध | र्मा | रा | ध | न | सं | नि | यु | क्त | ज | ग | ता | रा | ज्ञा | मु | ना | धि | ष्ठि | तः |
| सा | न्द्रो | त्फा | ल | मि | षा | द्वि | गा | य | ति | प | दा | स्प्र | ष्टुं | तु | रं | गो | ऽपि | गाम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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