अस्यासिर्भुजगः स्वकोशसुषिराकृष्टः स्फुरत्कृष्णिमा
कम्पोन्मीलदराललीलवलनस्तेषां भिये भूभुजाम् ।
सङ्ग्रामेषु निजाङ्गुलीमयमहासिद्धाषधीवीरुधः
पर्वास्ये विनिवेश्य जाङ्गुलिकता यैर्नाम नालम्बिता ॥
अस्यासिर्भुजगः स्वकोशसुषिराकृष्टः स्फुरत्कृष्णिमा
कम्पोन्मीलदराललीलवलनस्तेषां भिये भूभुजाम् ।
सङ्ग्रामेषु निजाङ्गुलीमयमहासिद्धाषधीवीरुधः
पर्वास्ये विनिवेश्य जाङ्गुलिकता यैर्नाम नालम्बिता ॥
कम्पोन्मीलदराललीलवलनस्तेषां भिये भूभुजाम् ।
सङ्ग्रामेषु निजाङ्गुलीमयमहासिद्धाषधीवीरुधः
पर्वास्ये विनिवेश्य जाङ्गुलिकता यैर्नाम नालम्बिता ॥
अन्वयः
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अस्य स्व-कोश-सुषिरात् आकृष्टः, स्फुरत्-कृष्णिमा, कम्प-उन्मीलत्-अराल-लील-वलनः असिः-भुजगः तेषाम् भू-भुजाम् भिये (भवति) यैः नाम सङ्ग्रामेषु निज-अङ्गुली-मय-महा-सिद्ध-ओषधी-वीरुधः पर्व-आस्ये विनिवेश्य जाङ्गुलिकता न आलम्बिता ।
Summary
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His sword, a serpent drawn from its sheath-hole, with its shining blackness and quivering, curved movements, terrifies those kings who have not resorted to being snake-charmers in battle by placing the potent herbal creepers of their fingers in their mouths (i.e., biting their fingers in fear).
पदच्छेदः
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| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| असिः | असि (१.१) | sword |
| भुजगः | भुजग (१.१) | serpent |
| स्वकोशसुषिरात् | स्व–कोश–सुषिर (५.१) | from the hole of its own sheath |
| आकृष्टः | आकृष्ट (आ√कृष्+क्त, १.१) | drawn |
| स्फुरत्कृष्णिमा | स्फुरत्–कृष्णिमन् (१.१) | whose blackness is shining |
| कम्पोन्मीलदराललीलवलनः | कम्प–उन्मीलत्–अराल–लील–वलन (१.१) | whose curved, playful movement is revealed by trembling |
| तेषां | तद् (६.३) | of those |
| भिये | भी (४.१) | for the fear |
| भूभुजाम् | भूभुज् (६.३) | of kings |
| सङ्ग्रामेषु | सङ्ग्राम (७.३) | in battles |
| निजाङ्गुलीमयमहासिद्धाषधीवीरुधः | निज–अङ्गुली–मय–महा–सिद्ध–ओषधी–वीरुध् (२.३) | the great potent herbal creepers made of their own fingers |
| पर्वास्ये | पर्वन्–आस्य (७.१) | in the mouth of the joints |
| विनिवेश्य | विनिवेश्य (वि+नि√विश्+ल्यप्) | having placed |
| जाङ्गुलिकता | जाङ्गुलिकता (१.१) | the state of being a snake-charmer |
| यैः | यद् (३.३) | by whom |
| नाम | नाम | indeed |
| न | न | not |
| आलम्बिता | आलम्बित (आ√लम्ब्+क्त, १.१) | resorted to |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्या | सि | र्भु | ज | गः | स्व | को | श | सु | षि | रा | कृ | ष्टः | स्फु | र | त्कृ | ष्णि | मा |
| क | म्पो | न्मी | ल | द | रा | ल | ली | ल | व | ल | न | स्ते | षां | भि | ये | भू | भु | जाम् |
| स | ङ्ग्रा | मे | षु | नि | जा | ङ्गु | ली | म | य | म | हा | सि | द्धा | ष | धी | वी | रु | धः |
| प | र्वा | स्ये | वि | नि | वे | श्य | जा | ङ्गु | लि | क | ता | यै | र्ना | म | ना | ल | म्बि | ता |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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