तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुरतुरगखुराग्रोद्धतैरन्धकारं
निर्वाणारिप्रतापानलजमिव सृजत्येष राजा रजोभिः ।
भूगोलच्छायमायामयगणितविदुन्नेयकायोऽभियाभू-
देतत्कीर्तिप्रतानैर्विधुभिरिव युधे राहुराहूयमानः ॥
तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुरतुरगखुराग्रोद्धतैरन्धकारं
निर्वाणारिप्रतापानलजमिव सृजत्येष राजा रजोभिः ।
भूगोलच्छायमायामयगणितविदुन्नेयकायोऽभियाभू-
देतत्कीर्तिप्रतानैर्विधुभिरिव युधे राहुराहूयमानः ॥
निर्वाणारिप्रतापानलजमिव सृजत्येष राजा रजोभिः ।
भूगोलच्छायमायामयगणितविदुन्नेयकायोऽभियाभू-
देतत्कीर्तिप्रतानैर्विधुभिरिव युधे राहुराहूयमानः ॥
अन्वयः
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एषः राजा तत्-तत्-दिक्-जैत्र-यात्रा-उद्धुर-तुरग-खुर-अग्र-उद्धतैः रजोभिः निर्वाण-अरि-प्रताप-अनल-जम् अन्धकारम् इव सृजति । भू-गोल-च्छाय-माया-मय-गणित-वित्-उन्नेय-कायः राहुः एतत्-कीर्ति-प्रतानैः विधुभिः इव युधे आहूयमानः (सन्) अभियाभूत् ।
Summary
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This king creates darkness with the dust from his horses' hooves, a darkness like soot from the extinguished fire of his enemies' valor. Rahu, whose body is only inferred by astronomers, seems to be challenged to a fight by the many moons of Nala's widespread fame and approaches for battle.
पदच्छेदः
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| तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुरतुरगखुराग्रोद्धतैः | तत्तद्दिग्जैत्रयात्रोद्धुरतुरगखुराग्रोद्धत (३.३) | by the dust raised by the tips of the hooves of impetuous horses in victorious marches in various directions |
| अन्धकारं | अन्धकार (२.१) | darkness |
| निर्वाणारिप्रतापानलजमिव | निर्वाण–अरि–प्रताप–अनल–ज (२.१)–इव | as if born from the extinguished fire of the enemies' valor |
| सृजति | सृजति (√सृज् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | creates |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| राजा | राजन् (१.१) | king |
| रजोभिः | रजस् (३.३) | with dust |
| भूगोलच्छायमायामयगणितविदुन्नेयकायो | भूगोलच्छायमायामयगणितविदुन्नेयकाय (१.१) | whose body is to be inferred by astronomers |
| अभियाभूत् | अभियाभूत् (अभि√या कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | approached for battle |
| एतत्कीर्तिप्रतानैः | एतद्–कीर्ति–प्रतान (३.३) | by the expanses of his fame |
| विधुभिः | विधु (३.३) | with moons |
| इव | इव | like |
| युधे | युध् (४.१) | for battle |
| राहुः | राहु (१.१) | Rahu |
| आहूयमानः | आहूयमान (आ√ह्वे+शानच्, १.१) | being challenged |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्त | द्दि | ग्जै | त्र | या | त्रो | द्धु | र | तु | र | ग | खु | रा | ग्रो | द्ध | तै | र | न्ध | का | रं |
| नि | र्वा | णा | रि | प्र | ता | पा | न | ल | ज | मि | व | सृ | ज | त्ये | ष | रा | जा | र | जो | भिः |
| भू | गो | ल | च्छा | य | मा | या | म | य | ग | णि | त | वि | दु | न्ने | य | का | यो | ऽभि | या | भू |
| दे | त | त्की | र्ति | प्र | ता | नै | र्वि | धु | भि | रि | व | यु | धे | रा | हु | रा | हू | य | मा | नः |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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