भूशक्रस्य यशांसि विक्रमभरेणोपाऋजितानि क्रमा-
देतस्य स्तुमहे महेमरदनस्पर्धीनि कैरक्षरैः ।
लिम्पद्भिः कृतकं कृतोऽपि रजतं राज्ञां यशःपारदै-
रस्य स्वर्णगिरिः प्रतापदहनैः स्वर्णं पुनर्निर्मितः ॥
भूशक्रस्य यशांसि विक्रमभरेणोपाऋजितानि क्रमा-
देतस्य स्तुमहे महेमरदनस्पर्धीनि कैरक्षरैः ।
लिम्पद्भिः कृतकं कृतोऽपि रजतं राज्ञां यशःपारदै-
रस्य स्वर्णगिरिः प्रतापदहनैः स्वर्णं पुनर्निर्मितः ॥
देतस्य स्तुमहे महेमरदनस्पर्धीनि कैरक्षरैः ।
लिम्पद्भिः कृतकं कृतोऽपि रजतं राज्ञां यशःपारदै-
रस्य स्वर्णगिरिः प्रतापदहनैः स्वर्णं पुनर्निर्मितः ॥
अन्वयः
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विक्रमभरेण क्रमात् उपार्जितानि, महेमरदनस्पर्धीनि एतस्य भूशक्रस्य यशांसि कैः अक्षरैः स्तुमहे? राज्ञां यशःपारदैः लिम्पद्भिः कृतकं रजतं कृतः अपि अस्य स्वर्णगिरिः प्रताप-दहनैः पुनः स्वर्णं निर्मितः ।
Summary
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With what words can we praise the glories of this Indra on earth, earned through his great valor, which rival the great tusks of celestial elephants? While other kings' quicksilver-like fame merely coats Mount Meru, making it artificially silver, this king's fires of prowess have remade it into pure gold again.
पदच्छेदः
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| भूशक्रस्य | भूशक्र (६.१) | of this Indra on earth |
| यशांसि | यशस् (२.३) | the glories |
| विक्रमभरेण | विक्रमभर (३.१) | by the weight of his valor |
| उपार्जितानि | उपार्जित (उप+आ√अर्ज्+क्त, २.३) | earned |
| क्रमात् | क्रमात् | in due course |
| एतस्य | एतद् (६.१) | of this |
| स्तुमहे | स्तुमहे (√स्तु कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. बहु.) | we praise |
| महेमरदनस्पर्धीनि | महा–इभ–रदन–स्पर्धिन् (२.३) | which rival the great tusks of the celestial elephants |
| कैः | किम् (३.३) | with what |
| अक्षरैः | अक्षर (३.३) | with letters |
| लिम्पद्भिः | लिम्पत् (√लिप्, ३.३) | by the smearing |
| कृतकम् | कृतक (२.१) | artificial |
| कृतः | कृत (√कृ+क्त, १.१) | made |
| अपि | अपि | even |
| रजतम् | रजत (२.१) | silver |
| राज्ञाम् | राजन् (६.३) | of (other) kings |
| यशःपारदैः | यशस्–पारद (३.३) | with the quicksilver of fame |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| स्वर्णगिरिः | स्वर्णगिरि (१.१) | the golden mountain (Meru) |
| प्रतापदहनैः | प्रताप–दहन (३.३) | by the fires of his prowess |
| स्वर्णम् | स्वर्ण (२.१) | gold |
| पुनः | पुनर् | again |
| निर्मितः | निर्मित (निर्√मा+क्त, १.१) | was made |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | श | क्र | स्य | य | शां | सि | वि | क्र | म | भ | रे | णो | पा | ऋ | जि | ता | नि | क्र | मा |
| दे | त | स्य | स्तु | म | हे | म | हे | म | र | द | न | स्प | र्धी | नि | कै | र | क्ष | रैः | |
| लि | म्प | द्भिः | कृ | त | कं | कृ | तो | ऽपि | र | ज | तं | रा | ज्ञां | य | शः | पा | र | दै | |
| र | स्य | स्व | र्ण | गि | रिः | प्र | ता | प | द | ह | नैः | स्व | र्णं | पु | न | र्नि | र्मि | तः | |
| म | स | ज | स | त | त | ग | |||||||||||||
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