एतद्गन्धगजस्तृषाम्भसि भृशं कण्ठान्तमज्जत्तनुः
फेनैः पाण्डुरितः स्वदिक्करिजयक्रीडायशःस्पर्धिभिः ।
दन्तद्वन्द्वजलानुबिम्बनचतुर्दन्तः कराम्भोवमि-
व्याजादभ्रमुवल्लभेन विरहं निर्वापयत्यम्बुधेः ॥
एतद्गन्धगजस्तृषाम्भसि भृशं कण्ठान्तमज्जत्तनुः
फेनैः पाण्डुरितः स्वदिक्करिजयक्रीडायशःस्पर्धिभिः ।
दन्तद्वन्द्वजलानुबिम्बनचतुर्दन्तः कराम्भोवमि-
व्याजादभ्रमुवल्लभेन विरहं निर्वापयत्यम्बुधेः ॥
फेनैः पाण्डुरितः स्वदिक्करिजयक्रीडायशःस्पर्धिभिः ।
दन्तद्वन्द्वजलानुबिम्बनचतुर्दन्तः कराम्भोवमि-
व्याजादभ्रमुवल्लभेन विरहं निर्वापयत्यम्बुधेः ॥
अन्वयः
AI
एतद्गन्धगजः तृषा अम्भसि भृशं कण्ठान्तमज्जत्तनुः, स्वदिक्करिजयक्रीडायशःस्पर्धिभिः फेनैः पाण्डुरितः, दन्तद्वन्द्वजलानुबिम्बनचतुर्दन्तः (सन्), कराम्भोवमिव्याजात् अभ्रमुवल्लभेन (कृतम्) अम्बुधेः विरहं निर्वापयति ।
Summary
AI
This king's ichor-scented elephant, entering the water up to its neck due to thirst, is whitened by foam that rivals the fame of its victory over the celestial elephants. Appearing four-tusked due to its reflection, it soothes the ocean's pain of separation from Airavata (born from the ocean) under the pretext of spouting water from its trunk.
पदच्छेदः
AI
| एतद्गन्धगजः | एतत्–गन्धगज (१.१) | this king's ichor-scented elephant |
| तृषा | तृष् (३.१) | with thirst |
| अम्भसि | अम्भस् (७.१) | in the water |
| भृशम् | भृशम् | very much |
| कण्ठान्तमज्जत्तनुः | कण्ठ–अन्त–मज्जत्–तनु (१.१) | its body submerged up to the neck |
| फेनैः | फेन (३.३) | with foam |
| पाण्डुरितः | पाण्डुरित (१.१) | made white |
| स्वदिक्करिजयक्रीडायशःस्पर्धिभिः | स्व–दिक्–करिन्–जय–क्रीडा–यशस्–स्पर्धिन् (३.३) | which rivals the fame of its playful victory over the elephants of the quarters |
| दन्तद्वन्द्वजलानुबिम्बनचतुर्दन्तः | दन्त–द्वन्द्व–जल–अनुबिम्बन–चतुर्दन्त (१.१) | appearing four-tusked due to the reflection of its two tusks in the water |
| कराम्भोवमिव्याजात् | कर–अम्भस्–वमि–व्याज (५.१) | under the pretext of spouting water from its trunk |
| अभ्रमुवल्लभेन | अभ्रमुवल्लभ (३.१) | by Airavata |
| विरहम् | विरह (२.१) | the separation |
| निर्वापयति | निर्वापयति (निर्√वा +णिच् लट्) | extinguishes |
| अम्बुधेः | अम्बुधि (६.१) | of the ocean |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | त | द्ग | न्ध | ग | ज | स्तृ | षा | म्भ | सि | भृ | शं | क | ण्ठा | न्त | म | ज्ज | त्त | नुः |
| फे | नैः | पा | ण्डु | रि | तः | स्व | दि | क्क | रि | ज | य | क्री | डा | य | शः | स्प | र्धि | भिः |
| द | न्त | द्व | न्द्व | ज | ला | नु | बि | म्ब | न | च | तु | र्द | न्तः | क | रा | म्भो | व | मि |
| व्या | जा | द | भ्र | मु | व | ल्ल | भे | न | वि | र | हं | नि | र्वा | प | य | त्य | म्बु | धेः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.