आत्मन्यस्य समुच्छ्रितीकृतगुणस्याहोतरामौचिती
यद्गाट्रान्तरवर्जनादजनयद्भूजानिरेष द्विषाम् ।
भूयोऽहं क्रियते स्म येन च हृदा स्कन्धो न यश्चानम-
त्तन्मर्माणि दलंदलं समिदलंकर्मीणबाणव्रजः ॥
आत्मन्यस्य समुच्छ्रितीकृतगुणस्याहोतरामौचिती
यद्गाट्रान्तरवर्जनादजनयद्भूजानिरेष द्विषाम् ।
भूयोऽहं क्रियते स्म येन च हृदा स्कन्धो न यश्चानम-
त्तन्मर्माणि दलंदलं समिदलंकर्मीणबाणव्रजः ॥
यद्गाट्रान्तरवर्जनादजनयद्भूजानिरेष द्विषाम् ।
भूयोऽहं क्रियते स्म येन च हृदा स्कन्धो न यश्चानम-
त्तन्मर्माणि दलंदलं समिदलंकर्मीणबाणव्रजः ॥
अन्वयः
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समुच्छ्रितीकृतगुणस्य अस्य आत्मनि अहोतरामौचिती, यत् एषः भूजानिः द्विषां गात्रान्तरवर्जनात् अजनयत् । येन हृदा भूयः अहं क्रियते स्म, यः स्कन्धः च न अनमत्, (तस्य) तन्मर्माणि समिदि अलंकर्मीणबाणव्रजः दलंदलं (अकरोत्) ।
Summary
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Oh, what great propriety in this king, who has elevated his virtues (and his bowstring)! He creates wounds on his enemies, avoiding other limbs. For the heart that showed pride and the neck that did not bow, his host of battle-expert arrows pierces their vital parts again and again in combat.
पदच्छेदः
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| आत्मनि | आत्मन् (७.१) | in himself |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this (king) |
| समुच्छ्रितीकृतगुणस्य | समुच्छ्रितीकृत–गुण (६.१) | of him whose virtues (bowstring) are made lofty |
| अहोतरामौचिती | अहो–तराम्–औचिती (१.१) | oh, what great propriety! |
| यत् | यद् | that |
| गाट्रान्तरवर्जनात् | गात्र–अन्तर–वर्जन (५.१) | from avoiding other limbs |
| अजनयत् | अजनयत् (√जन् +णिच् लङ्) | he produced |
| भूजानिः | भूजानि (१.१) | a birth on the earth (a wound) |
| एषः | एतद् (१.१) | this (king) |
| द्विषाम् | द्विष् (६.३) | of the enemies |
| भूयः | भूयस् | more |
| अहं क्रियते स्म | अहम्–क्रियते स्म (√कृ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | pride was shown |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| च | च | and |
| हृदा | हृद् (३.१) | by the heart |
| स्कन्धः | स्कन्ध (१.१) | shoulder/neck |
| न | न | not |
| यः | यद् (१.१) | which |
| च | च | and |
| अनमत् | अनमत् (√नम् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bowed |
| तन्मर्माणि | तद्–मर्मन् (२.३) | their vital parts |
| दलंदलम् | दलम्-दलम् | piercing again and again |
| समिदि | समित् (७.१) | in battle |
| अलंकर्मीणबाणव्रजः | अलंकर्मीण–बाण–व्रज (१.१) | his host of arrows, expert in battle |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | त्म | न्य | स्य | स | मु | च्छ्रि | ती | कृ | त | गु | ण | स्या | हो | त | रा | मौ | चि | ती |
| य | द्गा | ट्रा | न्त | र | व | र्ज | ना | द | ज | न | य | द्भू | जा | नि | रे | ष | द्वि | षाम् |
| भू | यो | ऽहं | क्रि | य | ते | स्म | ये | न | च | हृ | दा | स्क | न्धो | न | य | श्चा | न | म |
| त्त | न्म | र्मा | णि | द | लं | द | लं | स | मि | द | लं | क | र्मी | ण | बा | ण | व्र | जः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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