यत्कस्यामपि भानुमान्न ककुभि स्थेमानमालम्बते
जातं यद्धनकाननैकशरणप्राप्तेन दावाग्निना ।
एषैतद्भुजतेजसा विजितयोस्तावत्तयोरौचिती
धिक्तं वाडवमम्भसि द्विषि भिया येन प्रविष्टं पुनः ॥
यत्कस्यामपि भानुमान्न ककुभि स्थेमानमालम्बते
जातं यद्धनकाननैकशरणप्राप्तेन दावाग्निना ।
एषैतद्भुजतेजसा विजितयोस्तावत्तयोरौचिती
धिक्तं वाडवमम्भसि द्विषि भिया येन प्रविष्टं पुनः ॥
जातं यद्धनकाननैकशरणप्राप्तेन दावाग्निना ।
एषैतद्भुजतेजसा विजितयोस्तावत्तयोरौचिती
धिक्तं वाडवमम्भसि द्विषि भिया येन प्रविष्टं पुनः ॥
अन्वयः
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यत् भानुमान् कस्याम् अपि ककुभि स्थेमानं न आलम्बते, यत् दावाग्निना घनकाननैकशरणप्राप्तेन जातम्, एषा तावत् एतद्भुजतेजसा विजितयोः तयोः औचिती । तम् वाडवम् धिक् येन द्विषि भिया पुनः अम्भसि प्रविष्टम् ।
Summary
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That the sun cannot remain stable in any direction and that the forest fire has taken refuge in dense forests is appropriate for these two, having been conquered by the prowess of this king's arms. But shame on that submarine fire, which, out of fear of its enemy (the king's prowess), has re-entered the water.
पदच्छेदः
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| यत् | यद् | That |
| कस्यामपि | किम् (७.१)–अपि | in any |
| भानुमान् | भानुमत् (१.१) | the sun |
| न | न | not |
| ककुभि | ककुभ् (७.१) | direction |
| स्थेमानम् | स्थेमन् (२.१) | stability |
| आलम्बते | आलम्बते (आ√लम्ब् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | attains |
| जातम् | जात (√जन्+क्त, १.१) | it happened |
| यत् | यद् | that |
| घनकाननैकशरणप्राप्तेन | घन–कानन–एक–शरण–प्राप्त (३.१) | by the one who has taken refuge only in the dense forest |
| दावाग्निना | दावाग्नि (३.१) | by the forest fire |
| एषा | एतद् (१.१) | this |
| एतद्भुजतेजसा | एतत्–भुज–तेजस् (३.१) | by the prowess of this king's arms |
| विजितयोः | विजित (वि√जि+क्त, ६.२) | of the two who were conquered |
| तावत् | तावत् | indeed |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
| औचिती | औचिती (१.१) | propriety |
| धिक् | धिक् | shame on |
| तम् | तद् (२.१) | that |
| वाडवम् | वाडव (२.१) | the submarine fire |
| अम्भसि | अम्भस् (७.१) | in the water |
| द्विषि | द्विष् (७.१) | in the enemy |
| भिया | भी (३.१) | out of fear |
| येन | यद् (३.१) | by which |
| प्रविष्टम् | प्रविष्ट (प्र√विश्+क्त, १.१) | was entered |
| पुनः | पुनर् | again |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | त्क | स्या | म | पि | भा | नु | मा | न्न | क | कु | भि | स्थे | मा | न | मा | ल | म्ब | ते |
| जा | तं | य | द्ध | न | का | न | नै | क | श | र | ण | प्रा | प्ते | न | दा | वा | ग्नि | ना |
| ए | षै | त | द्भु | ज | ते | ज | सा | वि | जि | त | यो | स्ता | व | त्त | यो | रौ | चि | ती |
| धि | क्तं | वा | ड | व | म | म्भ | सि | द्वि | षि | भि | या | ये | न | प्र | वि | ष्टं | पु | नः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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