क्षीरोदन्वदपाः प्रमथ्य मथितादेशेऽमरैर्निर्मिते
स्वाक्रम्यं सृजतस्तदस्य यशसः क्षीरोदसिंहासनम् ।
केषां नाजनि वा जनेन जगतामेतत्कवित्वामृत-
स्रोतःप्रोतपिपासुकर्णकलसीभाजाभिषेकोत्सवः ॥
क्षीरोदन्वदपाः प्रमथ्य मथितादेशेऽमरैर्निर्मिते
स्वाक्रम्यं सृजतस्तदस्य यशसः क्षीरोदसिंहासनम् ।
केषां नाजनि वा जनेन जगतामेतत्कवित्वामृत-
स्रोतःप्रोतपिपासुकर्णकलसीभाजाभिषेकोत्सवः ॥
स्वाक्रम्यं सृजतस्तदस्य यशसः क्षीरोदसिंहासनम् ।
केषां नाजनि वा जनेन जगतामेतत्कवित्वामृत-
स्रोतःप्रोतपिपासुकर्णकलसीभाजाभिषेकोत्सवः ॥
अन्वयः
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अमरैः क्षीरोदन्वदपः प्रमथ्य निर्मिते मथितादेशे अस्य यशसः तत् स्वाक्रम्यं क्षीरोदसिंहासनं सृजतः (सतः), जगतां जनेन केषां वा एतत्कवित्वामृतस्रोतःप्रोतपिपासुकर्णकलसीभाजाभिषेकोत्सवः न अजनि?
Summary
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As this king's fame creates its own dominion, establishing a throne in the milky ocean at the very spot where the gods churned it, for which people of the worlds was the festival of consecration not celebrated by their thirsty ear-pitchers, eager to drink from the nectar-stream of his poetry?
पदच्छेदः
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| क्षीरोदन्वदपाः | क्षीर–उदन्वत्–अप् (२.३) | the waters of the milky ocean |
| प्रमथ्य | प्रमथ्य (प्र√मन्थ्+ल्यप्) | having churned |
| मथितादेशे | मथित (√मन्थ्+क्त)–आदेश (७.१) | in the place of churning |
| अमरैः | अमर (३.३) | by the gods |
| निर्मिते | निर्मित (निर्√मा+क्त, ७.१) | created |
| स्वाक्रम्यम् | स्व–आक्रम्य (२.१) | its own dominion |
| सृजतः | सृजत् (√सृज्, ६.१) | of the one creating |
| तत् | तद् | that |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this (king's) |
| यशसः | यशस् (६.१) | of the fame |
| क्षीरोदसिंहासनम् | क्षीर–उद–सिंहासन (२.१) | a throne of the milky ocean |
| केषाम् | किम् (६.३) | for whom |
| न | न | not |
| अजनि | अजनि (√जन् भावकर्मणोः लुङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was born/created |
| वा | वा | or |
| जनेन | जन (३.१) | by the people |
| जगताम् | जगत् (६.३) | of the worlds |
| एतत्कवित्वामृतस्रोतःप्रोतपिपासुकर्णकलसीभाजाभिषेकोत्सवः | एतत्–कवित्व–अमृत–स्रोतस्–प्रोत–पिपासु–कर्ण–कलसी–भाज्–अभिषेक–उत्सव (१.१) | the festival of consecration for those whose ear-pitchers are thirsty and pierced by the stream of nectar of this king's poetry |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षी | रो | द | न्व | द | पाः | प्र | म | थ्य | म | थि | ता | दे | शे | ऽम | रै | र्नि | र्मि | ते |
| स्वा | क्र | म्यं | सृ | ज | त | स्त | द | स्य | य | श | सः | क्षी | रो | द | सिं | हा | स | नम् |
| के | षां | ना | ज | नि | वा | ज | ने | न | ज | ग | ता | मे | त | त्क | वि | त्वा | मृ | त |
| स्रो | तः | प्रो | त | पि | पा | सु | क | र्ण | क | ल | सी | भा | जा | भि | षे | को | त्स | वः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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