अकर्णधाराशुगसंभृशाङ्गतां
गतैररित्रेण विनास्य वैरिभिः ।
विधाय यावत्तरणेर्भिदामहो
निमज्ज्य तीर्णः समरे भवार्णवः ॥
अकर्णधाराशुगसंभृशाङ्गतां
गतैररित्रेण विनास्य वैरिभिः ।
विधाय यावत्तरणेर्भिदामहो
निमज्ज्य तीर्णः समरे भवार्णवः ॥
गतैररित्रेण विनास्य वैरिभिः ।
विधाय यावत्तरणेर्भिदामहो
निमज्ज्य तीर्णः समरे भवार्णवः ॥
अन्वयः
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अहो! अस्य वैरिभिः समरे अकर्णधाराशुगसंभृशाङ्गतां गतैः (सद्भिः) अरित्रेण विना यावत्तरणेः भिदां विधाय निमज्ज्य भवार्णवः तीर्णः।
Summary
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Oh! In battle, his enemies, their bodies pierced by his arrows (which act as helmsmen), have crossed the ocean of worldly existence. Without any other oar, they broke the boat of their life, sank (died), and thus attained liberation.
पदच्छेदः
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| अकर्णधाराशुगसंभृशाङ्गताम् | अकर्णधार–आशुग–संभृश–अङ्गता (२.१) | the state of having bodies pierced by arrows that act as helmsmen |
| गतैः | गत (√गम्+क्त, ३.३) | by those who have gone |
| अरित्रेण | अरित्र (३.१) | oar |
| विना | विना | without |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| वैरिभिः | वैरिन् (३.३) | by the enemies |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having made |
| यावत्तरणेः | यावत्–तरणि (६.१) | of the boat of life |
| भिदाम् | भिदा (२.१) | a break |
| अहो | अहो | Oh! |
| निमज्ज्य | निमज्ज्य (नि√मस्ज्+ल्यप्) | having sunk |
| तीर्णः | तीर्ण (√तॄ+क्त, १.१) | is crossed |
| समरे | समर (७.१) | in battle |
| भवार्णवः | भव–अर्णव (१.१) | the ocean of existence |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | क | र्ण | धा | रा | शु | ग | सं | भृ | शा | ङ्ग | तां |
| ग | तै | र | रि | त्रे | ण | वि | ना | स्य | वै | रि | भिः |
| वि | धा | य | या | व | त्त | र | णे | र्भि | दा | म | हो |
| नि | म | ज्ज्य | ती | र्णः | स | म | रे | भ | वा | र्ण | वः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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