वयस्ययाकूतविदा दमस्वसुः
स्मितं वितत्याभिदधेऽथ भारती ।
इतः परेषामपि पश्य याचतां
भवन्मुखेन स्वनिवेदनत्वराम् ॥
वयस्ययाकूतविदा दमस्वसुः
स्मितं वितत्याभिदधेऽथ भारती ।
इतः परेषामपि पश्य याचतां
भवन्मुखेन स्वनिवेदनत्वराम् ॥
स्मितं वितत्याभिदधेऽथ भारती ।
इतः परेषामपि पश्य याचतां
भवन्मुखेन स्वनिवेदनत्वराम् ॥
अन्वयः
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अथ आकूतविदा वयस्यया (इव) भारती दमस्वसुः स्मितं वितत्य अभिदधे - इतः परेषाम् अपि याचतां भवन्मुखेन स्वनिवेदनत्वरां पश्य ।
Summary
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Then Saraswati, like a friend who understood Damayanti's intentions, smiled slightly and said, "Look, even these other supplicant kings are eager to be introduced through your mouth (i.e., they wish you would ask about them)."
पदच्छेदः
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| वयस्यया | वयस्या (३.१) | by the friend |
| आकूतविदा | आकूतविद् (३.१) | who knows the intention |
| दमस्वसुः | दमस्वसृ (६.१) | of Damayanti |
| स्मितम् | स्मित (√स्मि+क्त, २.१) | a smile |
| वितत्य | वितत्य (वि√तन्+ल्यप्) | spreading |
| अभिदधे | अभिदधे (अभि√धा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | said |
| अथ | अथ | then |
| भारती | भारती (१.१) | Saraswati |
| इतः | इतस् | from this |
| परेषाम् | पर (६.३) | of others |
| अपि | अपि | also |
| पश्य | पश्य (√दृश् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | see |
| याचताम् | याचत् (√याच्+शतृ, ६.३) | of the supplicants |
| भवन्मुखेन | भवत्–मुख (३.१) | through your mouth |
| स्वनिवेदनत्वराम् | स्व–निवेदन–त्वरा (२.१) | the eagerness for self-introduction |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | य | स्य | या | कू | त | वि | दा | द | म | स्व | सुः |
| स्मि | तं | वि | त | त्या | भि | द | धे | ऽथ | भा | र | ती |
| इ | तः | प | रे | षा | म | पि | प | श्य | या | च | तां |
| भ | व | न्मु | खे | न | स्व | नि | वे | द | न | त्व | राम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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