इमं परित्यज्य परं रणादरिः
स्वमेव भग्नः शरणं मुधाविशत् ।
न वेत्ति यत्त्रातुमितः कृतस्मयो
न दुर्गया शैलभुवापि शक्यते ॥
इमं परित्यज्य परं रणादरिः
स्वमेव भग्नः शरणं मुधाविशत् ।
न वेत्ति यत्त्रातुमितः कृतस्मयो
न दुर्गया शैलभुवापि शक्यते ॥
स्वमेव भग्नः शरणं मुधाविशत् ।
न वेत्ति यत्त्रातुमितः कृतस्मयो
न दुर्गया शैलभुवापि शक्यते ॥
अन्वयः
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अरिः इमं परित्यज्य रणात् भग्नः (सन्) परं स्वम् एव शरणं मुधा अविशत् । (सः) न वेत्ति यत् इतः कृतस्मयः (अरिः) शैलभुवा दुर्गया अपि त्रातुं न शक्यते ।
Summary
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His enemy, defeated in battle, flees from him and vainly seeks refuge elsewhere. He does not realize that once this king's pride is provoked, not even Durga, the daughter of the mountain, can protect him.
पदच्छेदः
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| इमम् | इदम् (२.१) | this one |
| परित्यज्य | परित्यज्य (परि√त्यज्+ल्यप्) | abandoning |
| परम् | पर (२.१) | another |
| रणात् | रण (५.१) | from the battle |
| अरिः | अरि (१.१) | the enemy |
| स्वम् | स्व (२.१) | his own |
| एव | एव | only |
| भग्नः | भग्न (√भञ्ज्+क्त, १.१) | defeated |
| शरणम् | शरण (२.१) | refuge |
| मुधा | मुधा | in vain |
| अविशत् | अविशत् (√विश् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | entered |
| न | न | not |
| वेत्ति | वेत्ति (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he knows |
| यत् | यत् | that |
| त्रातुम् | त्रातुम् (√त्रै+तुमुन्) | to protect |
| इतः | इतस् | from this one |
| कृतस्मयः | कृत–स्मय (१.१) | one whose pride is provoked |
| न | न | not |
| दुर्गया | दुर्गा (३.१) | by Durga |
| शैलभुवा | शैलभू (३.१) | the daughter of the mountain (Parvati) |
| अपि | अपि | even |
| शक्यते | शक्यते (√शक् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is able |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | मं | प | रि | त्य | ज्य | प | रं | र | णा | द | रिः |
| स्व | मे | व | भ | ग्नः | श | र | णं | मु | धा | वि | शत् |
| न | वे | त्ति | य | त्त्रा | तु | मि | तः | कृ | त | स्म | यो |
| न | दु | र्ग | या | शै | ल | भु | वा | पि | श | क्य | ते |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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