दमस्वसुश्चित्तमवेत्य हासिका
जगाद देवीं कियदस्य वक्ष्यसि ।
भण प्रभूते जगति स्थिते गुणै-
रिहाप्यते संकटवासयातना ॥
दमस्वसुश्चित्तमवेत्य हासिका
जगाद देवीं कियदस्य वक्ष्यसि ।
भण प्रभूते जगति स्थिते गुणै-
रिहाप्यते संकटवासयातना ॥
जगाद देवीं कियदस्य वक्ष्यसि ।
भण प्रभूते जगति स्थिते गुणै-
रिहाप्यते संकटवासयातना ॥
अन्वयः
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हासिका दमस्वसुः चित्तम् अवेत्य देवीम् जगाद - अस्य कियत् वक्ष्यसि? भण। जगति प्रभूते (गुणे) स्थिते (सति), इह (वाचि) गुणैः संकटवासयातना आप्यते।
Summary
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The smiling one (Sarasvati), understanding Damayanti's mind, said to the princess, 'How much more will you have me say about him? Speak up! While his virtues are abundant in the world, they suffer the torment of a narrow dwelling when confined to my speech.'
पदच्छेदः
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| दमस्वसुः | दमस्वसृ (६.१) | of Damayanti |
| चित्तम् | चित्त (२.१) | the mind |
| अवेत्य | अवेत्य (अव√इ+ल्यप्) | having understood |
| हासिका | हासिका (१.१) | the smiling one (Sarasvati) |
| जगाद | जगाद (√गद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | said |
| देवीम् | देवी (२.१) | to the princess |
| कियत् | कियत् | how much |
| अस्य | इदम् (६.१) | of this one |
| वक्ष्यसि | वक्ष्यसि (√वच् कर्तरि लृट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | will you speak |
| भण | भण (√भण् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | speak |
| प्रभूते | प्रभूत (प्र√भू+क्त, ७.१) | abundant |
| जगति | जगत् (७.१) | in the world |
| स्थिते | स्थित (√स्था+क्त, ७.१) | being present |
| गुणैः | गुण (३.३) | by virtues |
| इह | इह | here (in speech) |
| आप्यते | आप्यते (√आप् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is obtained |
| संकटवासयातना | संकट–वास–यातना (१.१) | the torment of dwelling in a narrow space |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द | म | स्व | सु | श्चि | त्त | म | वे | त्य | हा | सि | का |
| ज | गा | द | दे | वीं | कि | य | द | स्य | व | क्ष्य | सि |
| भ | ण | प्र | भू | ते | ज | ग | ति | स्थि | ते | गु | णै |
| रि | हा | प्य | ते | सं | क | ट | वा | स | या | त | ना |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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