न तूणादुद्धारे न गुणघटने नाश्रुतिशिखं
समाकृष्टौ दृष्टिर्न वियति न लक्ष्ये न च भुवि ।
नृणां पश्यत्यस्य क्वचन विशिखान्किं तु पतित-
द्विषद्वक्षःश्वभ्रैरनुमितिरसून्गोचरयति ॥
न तूणादुद्धारे न गुणघटने नाश्रुतिशिखं
समाकृष्टौ दृष्टिर्न वियति न लक्ष्ये न च भुवि ।
नृणां पश्यत्यस्य क्वचन विशिखान्किं तु पतित-
द्विषद्वक्षःश्वभ्रैरनुमितिरसून्गोचरयति ॥
समाकृष्टौ दृष्टिर्न वियति न लक्ष्ये न च भुवि ।
नृणां पश्यत्यस्य क्वचन विशिखान्किं तु पतित-
द्विषद्वक्षःश्वभ्रैरनुमितिरसून्गोचरयति ॥
अन्वयः
AI
नृणाम् दृष्टिः अस्य विशिखान् तूणात् उद्धारे न, गुणघटने न, आश्रुतिशिखम् समाकृष्टौ न, वियति न, लक्ष्ये न, भुवि च क्वचन न पश्यति। किं तु पतितद्विषद्वक्षःश्वभ्रैः अनुमितिः असून् गोचरयति।
Summary
AI
People's eyes do not see his arrows anywhere: not when drawn from the quiver, not when fixed to the string, not when pulled back to the ear, not in the sky, not on the target, and not on the ground. But, the inference drawn from the gaping wounds on the chests of fallen enemies makes their departed life-breaths perceptible.
पदच्छेदः
AI
| न | न | Not |
| तूणात् | तूण (५.१) | from the quiver |
| उद्धारे | उद्धार (७.१) | in the drawing out |
| न | न | not |
| गुणघटने | गुण–घटन (७.१) | in the fixing to the string |
| न | न | not |
| आश्रुतिशिखं | आश्रुति–शिखम् | up to the tip of the ear |
| समाकृष्टौ | समाकृष्टि (७.१) | in the drawing back |
| दृष्टिः | दृष्टि (१.१) | sight |
| न | न | not |
| वियति | वियत् (७.१) | in the sky |
| न | न | not |
| लक्ष्ये | लक्ष्य (७.१) | on the target |
| न | न | not |
| च | च | and |
| भुवि | भू (७.१) | on the ground |
| नृणाम् | नृ (६.३) | of men |
| पश्यति | पश्यति (√दृश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | sees |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| क्वचन | क्वचन | anywhere |
| विशिखान् | विशिख (२.३) | arrows |
| किं | किम् | but |
| तु | तु | |
| पतितद्विषद्वक्षःश्वभ्रैः | पतित–द्विषत्–वक्षस्–श्वभ्र (३.३) | by the gaping wounds on the chests of fallen enemies |
| अनुमितिः | अनुमिति (१.१) | inference |
| असून् | असु (२.३) | life-breaths |
| गोचरयति | गोचरयति (√गोचरय् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | makes perceptible |
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | तू | णा | दु | द्धा | रे | न | गु | ण | घ | ट | ने | ना | श्रु | ति | शि | खं |
| स | मा | कृ | ष्टौ | दृ | ष्टि | र्न | वि | य | ति | न | ल | क्ष्ये | न | च | भु | वि |
| नृ | णां | प | श्य | त्य | स्य | क्व | च | न | वि | शि | खा | न्किं | तु | प | ति | त |
| द्वि | ष | द्व | क्षः | श्व | भ्रै | र | नु | मि | ति | र | सू | न्गो | च | र | य | ति |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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