स्मितश्रिया सृक्कणि लीयमानया-
वितीर्णया तद्गुणशर्मणेव सा ।
उपाहसत्कीर्त्यमहत्त्वमेव तं
गिरां हि पारे निषधेन्द्रवैभवम् ॥
स्मितश्रिया सृक्कणि लीयमानया-
वितीर्णया तद्गुणशर्मणेव सा ।
उपाहसत्कीर्त्यमहत्त्वमेव तं
गिरां हि पारे निषधेन्द्रवैभवम् ॥
वितीर्णया तद्गुणशर्मणेव सा ।
उपाहसत्कीर्त्यमहत्त्वमेव तं
गिरां हि पारे निषधेन्द्रवैभवम् ॥
अन्वयः
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सा, तद्गुणशर्मणा इव सृक्कणि लीयमानया अवितीर्णया स्मितश्रिया, गिराम् पारे (स्थितम्) निषधेन्द्रवैभवम् (स्मरन्ती) तम् (राजानम्) कीर्त्यमहत्त्वम् एव उपाहसत् हि।
Summary
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She (Damayanti), with a lingering, unexpressed smile at the corner of her mouth, as if from the joy of hearing his qualities, gently mocked the very greatness being praised. For, she was remembering the glory of Nala, the lord of Nishadha, which is beyond the range of words.
पदच्छेदः
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| स्मितश्रिया | स्मित–श्री (३.१) | with the beauty of a smile |
| सृक्कणि | सृक्कणि (७.१) | at the corner of the mouth |
| लीयमानया | लीयमान (√ली+शानच्, ३.१) | lingering |
| अवितीर्णया | अवितीर्ण (अ+वि√तृ+क्त, ३.१) | unexpressed |
| तद्गुणशर्मणा | तद्–गुण–शर्मन् (३.१) | by the joy of his virtues |
| इव | इव | as if |
| सा | तद् (१.१) | she |
| उपाहसत् | उपाहसत् (उप√हस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | mocked |
| कीर्त्यमहत्त्वम् | कीर्त्य–महत्त्व (२.१) | the greatness being praised |
| एव | एव | only |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| गिराम् | गिर् (६.३) | of words |
| हि | हि | indeed |
| पारे | पार (७.१) | beyond the range |
| निषधेन्द्रवैभवम् | निषध–इन्द्र–वैभव (२.१) | the glory of the Lord of Nishadha (Nala) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्मि | त | श्रि | या | सृ | क्क | णि | ली | य | मा | न | या |
| वि | ती | र्ण | या | त | द्गु | ण | श | र्म | णे | व | सा |
| उ | पा | ह | स | त्की | र्त्य | म | ह | त्त्व | मे | व | तं |
| गि | रां | हि | पा | रे | नि | ष | धे | न्द्र | वै | भ | वम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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