आचूडाग्रममज्जयज्जयपटुर्यच्छल्यदण्डानयं
संरम्भे रिपुराजकुञ्जरघटाकुम्भस्थलेषु स्थिरान् ।
सा सेवास्य पृथुः प्रसीदति तया नास्मै कुतस्त्वत्कुच-
स्पर्धागर्धिषु तेषु तान्धृतवते दण्डान्प्रदण्डानपि ॥
आचूडाग्रममज्जयज्जयपटुर्यच्छल्यदण्डानयं
संरम्भे रिपुराजकुञ्जरघटाकुम्भस्थलेषु स्थिरान् ।
सा सेवास्य पृथुः प्रसीदति तया नास्मै कुतस्त्वत्कुच-
स्पर्धागर्धिषु तेषु तान्धृतवते दण्डान्प्रदण्डानपि ॥
संरम्भे रिपुराजकुञ्जरघटाकुम्भस्थलेषु स्थिरान् ।
सा सेवास्य पृथुः प्रसीदति तया नास्मै कुतस्त्वत्कुच-
स्पर्धागर्धिषु तेषु तान्धृतवते दण्डान्प्रदण्डानपि ॥
अन्वयः
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जयपटुः अयम् संरम्भे रिपुराजकुञ्जरघटाकुम्भस्थलेषु स्थिरान् शल्यदण्डान् यत् आचूडाग्रम् अमज्जयत्, (तत्) अस्य सा पृथुः सेवा (अस्ति)। तया (सेवया) प्रसीदति (त्वयि सति) त्वत्कुचस्पर्धागर्धिषु तेषु (कुम्भस्थलेषु) तान् प्रदण्डान् अपि दण्डान् धृतवते अस्मै कुतः न (प्रसीदसि)?
Summary
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This victor, in the fury of battle, plunged his firm spear-shafts deep into the frontal globes of the enemy kings' elephants. This is his great service. By this service, he pleases. Why are you not pleased with him, who inflicted these excellent punishments (spears) on those globes which are greedy to rival your breasts?
पदच्छेदः
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| आचूडाग्रम् | आ-चूडा-अग्रम् | up to the tip of the crest |
| अमज्जयत् | अमज्जयत् (√मस्ज् +णिच् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | caused to sink |
| जयपटुः | जयपटु (१.१) | skilled in victory |
| यत् | यद् | since |
| शल्यदण्डान् | शल्यदण्ड (२.३) | shafts of spears |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| संरम्भे | संरम्भ (७.१) | in the fury of battle |
| रिपुराजकुञ्जरघटाकुम्भस्थलेषु | रिपु–राजन्–कुञ्जर–घटा–कुम्भ–स्थल (७.३) | on the frontal globes of the troop of enemy kings' elephants |
| स्थिरान् | स्थिर (२.३) | firm |
| सा | तद् (१.१) | that |
| सेवा | सेवा (१.१) | service |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| पृथुः | पृथु (१.१) | great |
| प्रसीदति | प्रसीदति (प्र√सद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is pleased |
| तया | तद् (३.१) | by that |
| न | न | not |
| अस्मै | इदम् (४.१) | to him |
| कुतः | कुतः | why |
| त्वत्कुचस्पर्धागर्धिषु | युष्मद्–कुच–स्पर्धा–गर्धिन् (७.३) | on those greedy for rivalry with your breasts |
| तेषु | तद् (७.३) | on those |
| तान् | तद् (२.३) | them |
| धृतवते | धृतवत् (√धृ+क्तवतु, ४.१) | to him who held |
| दण्डान् | दण्ड (२.३) | punishments |
| प्रदण्डान् | प्रदण्ड (२.३) | excellent punishments |
| अपि | अपि | also |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | चू | डा | ग्र | म | म | ज्ज | य | ज्ज | य | प | टु | र्य | च्छ | ल्य | द | ण्डा | न | यं |
| सं | र | म्भे | रि | पु | रा | ज | कु | ञ्ज | र | घ | टा | कु | म्भ | स्थ | ले | षु | स्थि | रान् |
| सा | से | वा | स्य | पृ | थुः | प्र | सी | द | ति | त | या | ना | स्मै | कु | त | स्त्व | त्कु | च |
| स्प | र्धा | ग | र्धि | षु | ते | षु | ता | न्धृ | त | व | ते | द | ण्डा | न्प्र | द | ण्डा | न | पि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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