अन्तःसंतोषबाष्पैः स्थगयति न दृशस्ताभिराकर्णयिष्य-
न्नङ्गे नानस्तिरोमा रचयति पुलकश्रेणिमानन्दकन्दाम् ।
न क्षोणीभङ्गभीरुः कलयति च शिरःकम्पनं तन्न विद्मः
शृण्वन्नेतस्य कीर्तीः कथमुरगपतिः प्रीतिमाविष्करोति ॥
अन्तःसंतोषबाष्पैः स्थगयति न दृशस्ताभिराकर्णयिष्य-
न्नङ्गे नानस्तिरोमा रचयति पुलकश्रेणिमानन्दकन्दाम् ।
न क्षोणीभङ्गभीरुः कलयति च शिरःकम्पनं तन्न विद्मः
शृण्वन्नेतस्य कीर्तीः कथमुरगपतिः प्रीतिमाविष्करोति ॥
न्नङ्गे नानस्तिरोमा रचयति पुलकश्रेणिमानन्दकन्दाम् ।
न क्षोणीभङ्गभीरुः कलयति च शिरःकम्पनं तन्न विद्मः
शृण्वन्नेतस्य कीर्तीः कथमुरगपतिः प्रीतिमाविष्करोति ॥
अन्वयः
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उरगपतिः एतस्य कीर्तीः शृण्वन्, ताभिः (कीर्तिभिः) आकर्णयिष्यन् (सन्) अन्तःसंतोषबाष्पैः दृशः न स्थगयति। (तस्य) अङ्गे रोमा न अनस्ति (येन सः) आनन्दकन्दाम् पुलकश्रेणीम् रचयति। क्षोणीभङ्गभीरुः (सन्) शिरःकम्पनम् च न कलयति। तत् उरगपतिः कथम् प्रीतिम् आविष्करोति (इति) न विद्मः।
Summary
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While hearing this king's glories, Shesha, the serpent king, does not cover his eyes with tears of inner joy, lest he be unable to hear. He has no body hair to create horripilation from joy. Fearing the earth would shatter, he does not nod his head in approval. Therefore, we do not know how he expresses his pleasure.
पदच्छेदः
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| अन्तःसंतोषबाष्पैः | अन्तर्–संतोष–बाष्प (३.३) | with tears of inner joy |
| स्थगयति | स्थगयति (√स्थगय् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | covers |
| न | न | not |
| दृशः | दृश् (२.३) | his eyes |
| ताभिः | तद् (३.३) | with them |
| आकर्णयिष्यन् | आकर्णयिष्यन् (आ√कर्ण्+णिच्+स्य+शतृ, १.१) | wishing to hear |
| अङ्गे | अङ्ग (७.१) | on his body |
| न | न | not |
| अनस्ति | अन्-अस्ति | there are no |
| रोमा | रोमन् (१.१) | hairs |
| रचयति | रचयति (√रच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | creates |
| पुलकश्रेणीम् | पुलक–श्रेणी (२.१) | a line of horripilation |
| आनन्दकन्दाम् | आनन्द–कन्दा (२.१) | which is the root of joy |
| न | न | not |
| क्षोणीभङ्गभीरुः | क्षोणी–भङ्ग–भीरु (१.१) | afraid of the earth breaking |
| कलयति | कलयति (√कलय् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | performs |
| च | च | and |
| शिरःकम्पनं | शिरस्–कम्पन (२.१) | shaking of the head |
| तत् | तद् | therefore |
| न | न | not |
| विद्मः | विद्मः (√विद् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we know |
| शृण्वन् | शृण्वन् (√श्रु+शतृ, १.१) | while hearing |
| एतस्य | एतद् (६.१) | his |
| कीर्तीः | कीर्ति (२.३) | glories |
| कथम् | कथम् | how |
| उरगपतिः | उरगपति (१.१) | the lord of serpents (Shesha) |
| प्रीतिम् | प्रीति (२.१) | pleasure |
| आविष्करोति | आविष्करोति (आविस्√कृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | reveals |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | न्तः | सं | तो | ष | बा | ष्पैः | स्थ | ग | य | ति | न | दृ | श | स्ता | भि | रा | क | र्ण | यि | ष्य |
| न्न | ङ्गे | ना | न | स्ति | रो | मा | र | च | य | ति | पु | ल | क | श्रे | णि | मा | न | न्द | क | न्दाम् |
| न | क्षो | णी | भ | ङ्ग | भी | रुः | क | ल | य | ति | च | शि | रः | क | म्प | नं | त | न्न | वि | द्मः |
| शृ | ण्व | न्ने | त | स्य | की | र्तीः | क | थ | मु | र | ग | प | तिः | प्री | ति | मा | वि | ष्क | रो | ति |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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