नृपानुपक्रम्य विभूषितासना-
न्सनातनी सा सुषुवे सरस्वती ।
विहारमारभ्य सरस्वतीः सुधा-
सरःस्वतीवार्द्रतनूरनूत्थिताः ॥
नृपानुपक्रम्य विभूषितासना-
न्सनातनी सा सुषुवे सरस्वती ।
विहारमारभ्य सरस्वतीः सुधा-
सरःस्वतीवार्द्रतनूरनूत्थिताः ॥
न्सनातनी सा सुषुवे सरस्वती ।
विहारमारभ्य सरस्वतीः सुधा-
सरःस्वतीवार्द्रतनूरनूत्थिताः ॥
अन्वयः
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सनातनी सा सरस्वती विभूषित-आसनान् नृपान् उपक्रम्य, सुधा-सरःसु विहारम् आरभ्य अनूत्थिताः अति-सु-आर्द्र-तनूः इव सरस्वतीः सुषुवे ।
Summary
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The eternal goddess Sarasvati, approaching the kings seated on their adorned thrones, began to produce speeches. Her words were like celestial nymphs with bodies thoroughly moistened and refreshed, having just risen after sporting in a lake of nectar.
पदच्छेदः
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| नृपान् | नृप (२.३) | the kings |
| उपक्रम्य | उपक्रम्य (उप√क्रम्+ल्यप्) | having approached |
| विभूषित | विभूषित (√भूष्+क्त) | adorned |
| आसनान् | आसन (२.३) | whose seats were |
| सनातनी | सनातनी (१.१) | the eternal one |
| सा | तद् (१.१) | she |
| सुषुवे | सुषुवे (√षू कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | produced |
| सरस्वती | सरस्वती (१.१) | Sarasvati |
| विहारम् | विहार (२.१) | sport |
| आरभ्य | आरभ्य (आ√रभ्+ल्यप्) | having begun |
| सरस्वतीः | सरस्वती (२.३) | speeches |
| सुधा | सुधा | nectar |
| सरःसु | सरस् (७.३) | in the lakes of |
| अति | अति | very |
| सु | सु | well |
| आर्द्र | आर्द्र | moistened |
| तनूः | तनू (२.३) | whose bodies were |
| अनूत्थिताः | अनूत्थित (अनु+उद्√स्था+क्त, २.३) | risen up after |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| नृ | पा | नु | प | क्र | म्य | वि | भू | षि | ता | स | ना |
| न्स | ना | त | नी | सा | सु | षु | वे | स | र | स्व | ती |
| वि | हा | र | मा | र | भ्य | स | र | स्व | तीः | सु | धा |
| स | रः | स्व | ती | वा | र्द्र | त | नू | र | नू | त्थि | ताः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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