सिन्धोर्जैत्रमयं पवित्रमसृजत्तत्कीर्तिपूर्ताद्भुतं
यत्र स्नान्ति जगन्ति सन्ति कवयः केवा न वाचंयमाः ।
यद्बिन्दुश्रियमिन्दुरञ्चति जलं चाविश्य दृश्येतरो
यस्यासौ जलदेवतास्फटिकभूर्जागर्ति यागेश्वरः ॥
सिन्धोर्जैत्रमयं पवित्रमसृजत्तत्कीर्तिपूर्ताद्भुतं
यत्र स्नान्ति जगन्ति सन्ति कवयः केवा न वाचंयमाः ।
यद्बिन्दुश्रियमिन्दुरञ्चति जलं चाविश्य दृश्येतरो
यस्यासौ जलदेवतास्फटिकभूर्जागर्ति यागेश्वरः ॥
यत्र स्नान्ति जगन्ति सन्ति कवयः केवा न वाचंयमाः ।
यद्बिन्दुश्रियमिन्दुरञ्चति जलं चाविश्य दृश्येतरो
यस्यासौ जलदेवतास्फटिकभूर्जागर्ति यागेश्वरः ॥
अन्वयः
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अयम् तत् कीर्तिपूर्ताद्भुतम् जैत्रम् पवित्रम् सिन्धोः असृजत्, यत्र जगन्ति स्नान्ति, (यत् वर्णयितुम्) के कवयः वा वाचम्यमाः न सन्ति? इन्दुः यद्बिन्दुश्रियम् अञ्चति, यस्य जलम् आविश्य च असौ यागेश्वरः जलदेवतास्फटिकभूः (सन्) दृश्येतरः जागर्ति।
Summary
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This king created a victorious and pure ocean, a wonderful pious act of his fame, in which all the worlds bathe. What poets are not rendered speechless in describing it? The moon attains the beauty of its drops. And having entered its water, Varuna, the lord of sacrifices, remains awake but invisible, as if in his crystal mansion.
पदच्छेदः
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| सिन्धोः | सिन्धु (२.१) | an ocean |
| जैत्रम् | जैत्र (२.१) | victorious |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| पवित्रम् | पवित्र (२.१) | pure |
| असृजत् | असृजत् (√सृज् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | created |
| तत्कीर्तिपूर्ताद्भुतम् | तद्–कीर्ति–पूर्त–अद्भुत (२.१) | that wonderful pious work of his fame |
| यत्र | यत्र | where |
| स्नान्ति | स्नान्ति (√स्ना कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bathe |
| जगन्ति | जगत् (१.३) | the worlds |
| सन्ति | सन्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | are |
| कवयः | कवि (१.३) | poets |
| के | किम् (१.३) | who |
| वा | वा | or |
| न | न | not |
| वाचंयमाः | वाचंयम (१.३) | silent |
| यद्बिन्दुश्रियम् | यद्–बिन्दु–श्री (२.१) | whose drop's beauty |
| इन्दुः | इन्दु (१.१) | the moon |
| अञ्चति | अञ्चति (√अञ्च् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| जलम् | जल (२.१) | water |
| च | च | and |
| आविश्य | आविश्य (आ√विश्+ल्यप्) | having entered |
| दृश्येतरः | दृश्य–इतर (१.१) | invisible |
| यस्य | यद् (६.१) | of which |
| असौ | अदस् (१.१) | that |
| जलदेवतास्फटिकभूः | जलदेवता–स्फटिक–भू (१.१) | the crystal mansion of the water deity |
| जागर्ति | जागर्ति (√जागृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is awake |
| यागेश्वरः | यागेश्वर (१.१) | the lord of sacrifices (Varuna) |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सि | न्धो | र्जै | त्र | म | यं | प | वि | त्र | म | सृ | ज | त्त | त्की | र्ति | पू | र्ता | द्भु | तं |
| य | त्र | स्ना | न्ति | ज | ग | न्ति | स | न्ति | क | व | यः | के | वा | न | वा | चं | य | माः |
| य | द्बि | न्दु | श्रि | य | मि | न्दु | र | ञ्च | ति | ज | लं | चा | वि | श्य | दृ | श्ये | त | रो |
| य | स्या | सौ | ज | ल | दे | व | ता | स्फ | टि | क | भू | र्जा | ग | र्ति | या | गे | श्व | रः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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